भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

( २१ )

"१ वृक, २ दामानि, ३ 'तथा अन्य', ( ३-८ ) छह त्रिगर्तों का मण्डल ( इस मंडल के छह सदस्य कौण्डोपरथ, दाण्डकी, कौष्टकी, जलमानि, ब्राह्म गुप्त और जानकि होते थे ), ९ यौधेय तथा अन्य, १० पार्श्व तथा अन्य, ११ क्षुद्रक, १२ मालव, १३ कठ, १४ सौभूति, १५ शिबि, १६ पारल, १७ भागल १८ कंबोज, १९ सुराष्ट्र, २० क्षत्रिय, २१ श्रेणी, २२ ब्रह्माणक, २३ अंबष्ठ" ( डांगे पृ० १९३ )

इनमें से अधिकांश गणों का निवासस्थान बाहीक प्रदेश था। यह वाहीक प्रदेश सिन्धु नदी की घाटी में पंजाब से लेकर सिन्ध के दक्षिण तक फैला हुआ था। जिन छह त्रिगर्तों का ऊपर उल्लेख किया गया है, वे जम्मू के निकट हिमालय के पर्वतीय जिलों में रहते थे। इन गण-संघों में सैनिक लोकतंत्र का प्रभुत्व था और उनमें इतना दृढ़ संगठन था कि सिंधु नदी के तट पर सिकन्दर की शक्तिशाली सेना को उनसे हार माननी पड़ी थी।

राजशब्दोपजीवी संघ : प्राचीन गणतंत्रों के प्रसंग में कौटिल्य ने राज-शब्दोपजीवी नामक एक दूसरी श्रेणी के गणों का उल्लेख किया है। ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ६६९ ) । श्रेणी के गणों में लिच्छवी, मल्ल, शाक्य, मौर्य, कुकुर, माद्र, अंधक-वृष्णी, कुरु और पांचाल आदि को रखा जा सकता है। इन गणों में संपत्ति-भेद, गण-युद्ध और लोकतंत्र की शिथिलता के कारण उनकी शासन-व्यवस्था इतनी दुर्बल हो चुकी थी कि उनमें नेतृत्व का आधार पैतृक-परंपरा मात्र रह गया था। उनके निर्वाचित व्यक्तियों की सभाएँ राजन् कहलाती थीं। अकेले लिच्छवियों के ७,७०७ राजन् थे । ये लोग शासन-सत्ता को चलाने के लिए कार्यकारिणी सभाओं, अफसरों तथा नायकों का निर्वाचन करते थे। इसी लिए कौटिल्य के इन गण-संघों को, उनकी कार्य-व्यवस्था के अनुरूप राजशब्दोपजीवी संघ कहा है।

दण्डप्रधान दास-व्यवस्था की विजय और विश लोकतंत्रों के दमन के बाद समाज में भयंकर शोषण और आर्थिक विकास का आरंभ हुआ। विस्तृत भूमि-खंडों को कृषियोग्य बनाया गया और इतिहास में पहली बार प्रादेशिक राज्य का अस्तित्व प्रकाश में आने लगा। इस प्रकार की वर्ग-विशिष्ट राजतंत्रवादी राज्य-व्यवस्था ने पशुधन तथा स्वतंत्र प्रजा का बहिष्कार कर दिया और शांति के उद्देश्यों पर आधारित गण के साम्यसंघ को समाप्त कर दिया। यहीं से राज्य-व्यवस्था और दण्ड-व्यवस्था का आरंभ हुआ।