कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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(१) तालचापदारवशाङ्गीणि कार्मुककोदण्डद्रूणा धनूंषि । (२) मूर्वार्कशणगवेधुवेणुस्नायूनि ज्याः । (३) वेणुशरशलाकादण्डासननाराचाश्च इषवः । तेषां मुखानि छेदन-भेदनताडनान्यायसास्थिदारवाणि । (४) निस्त्रिंशमण्डलाग्रासियष्टयः खड्गाः । खड्गमहिषवारणविषाणदारुवेणूमूलानि त्सरवः । (५) परशुकुठारपट्टसखनित्रकुद्दालक्रकचकाण्डच्छेदनाः क्षुरकल्पाः । (६) यन्त्रगोष्पणमुष्टिपाषाणरोचनीदृषदश्चायुधानि । (७) लोहजालजालिकापट्टकवचसूत्रकङ्कटशिशुमारखड्गधेनुकहस्तिगोचर्मखुरभृङ्गसंघातं वर्मणि । शिरस्त्राणकण्ठत्राणकूर्पासकञ्चुकवारवाण-
त्रासिका ( प्रास जितनी, सम्पूर्ण लोहे की बनी ); ये सब हथियार हलमुख कहलाते हैं, क्योंकि इन सभी का अग्रभाग हल के अग्रभाग की तरह तेज होता है ।
( १ ) धनुष चार प्रकार से बनाये जाते हैं : १. ताल ( ताड़ का बना हुआ ), २. चाप ( अच्छे बाँस का बना हुआ ), ३. दारव ( मजबूत लकड़ी का बना हुआ ) और ४. शाङ्ग ( सींगों का बना हुआ ); आकृति और क्रिया-भेद से इनके कार्मुक, कोदण्ड और द्रूण, आदि नाम हैं ।
( २ ) मूर्वा, आख सन, गवेधुकावेणु ( रामबाँस ) और ताँत; इनसे मजबूत धनुष की डोरी बनती है ।
( ३ ) बाण के भी अनेक भेद हैं, जिनके प्रकार हैं : १. वेणु ( बाँस ), २. शर ( नरसल ), ३. शालाका ( मजबूत लकड़ी ), ४. दण्डासन ( आधा लोहा और आधा बाँस ) और ५. नाराच ( सम्पूर्ण लोहे का ) । इन बाणों के अग्रभाग में लोहे, हड्डी तथा मजबूत लकड़ी की बनी नोक छेदने, काटने, आघात पहुँचाने वाला रक्त-सहित एवं रक्तरहित घाव करने के लिए लगी रहती है ।
( ४ ) खड्ग ( तलवार ) तीन प्रकार के होते हैं : १. निस्त्रिंश ( जिसका अगला भाग काफी टेढ़ा हो ), २. मण्डलाग्र ( जिसका अगला हिस्सा कुछ गोलाकार हो ) और ३. असियष्टि ( जिसका आकार पतला एवं लम्बा हो ) । खड्ग के लिए गैंडा, भैंस की सींग, हाथीदाँत, मजबूत लकड़ी और बाँस की जड़ की मूठ बनवानी चाहिए ।
( ५ ) फरसा, कुल्हाड़ा, द्विमुखी त्रिशूल, फावड़ा, कुदाल, आरा और गँड़ासा; ये सब छुरे की धार की भाँति तेज होने के कारण क्षुरकल्प या क्षुरवर्ग के हथियार कहलाते हैं ।
( ६ ) यन्त्रपाषाण, गोष्पणपाषाण, मुष्टिपाषाण, रोचनी और दृषद; ये सब आयुध कहलाते हैं ।
( ७ ) कवच छह प्रकार से बनाये जाते हैं, जिनके तरीके इस प्रकार हैं : १. लोहजाल ( सिर से पैर तक ढकने वाला ), २. लोहजालिका सिर के अलावा सारे