भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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१९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) रज्जुवर्त्तकैश्चर्मकारैश्च स्वयं संसृज्येत। भाण्डानि च वरत्रादीनि वर्तयेत्। (२) सूत्रवल्कमयी रज्जूर्वरत्रा वैत्रवैणवीः। सांनाह्या बन्धनीयाश्च यानयुग्यस्य कारयेत्॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूत्राध्यक्षो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः, आदितस्त्रयश्चत्वारिंशः।

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यही दण्ड उसको भी देना चाहिए, जो माल को चुराये, खो दे अथवा लेकर भाग जाय। प्रत्येक कर्मचारी को उसके अपराध के अनुसार शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए।

(१) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह रस्सी वटकर जीविकोपार्जन करने वाले तथा चमड़े का कार्य करने वाले कारीगरों से सम्पर्क बनाये रखे। उनसे वह गाय आदि बाँधने के लिए रस्सी तथा हर तरह का चमड़े आदि का सामान बनवाता रहे।

(२) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह सूत, सन आदि की रस्सियां और कवच बनाने तथा घोड़ा बांधने के उपयोगी बेत एवं बाँस की रस्सियां बनवाये।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सूत्राध्यक्ष नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त।

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