कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वर्षत्रिभागः पूर्वपश्चिममासयोः, द्वौ त्रिभागौ मध्यमयोः सुषमारूपम् । (२) तस्योपलब्धिर्बृहस्पतेः स्थानगमनगर्भाधानेभ्यः शुक्रोदयास्तमयचारेभ्यः सूर्यस्य प्रकृतिवैकृताच्च । (३) सूर्याद्बीजसिद्धिः । बृहस्पतेः सस्यानां स्तम्बकारिता । शुक्राद्वृष्टिरिति । (४) त्रयः साप्ताहिका मेघा अशीतिः कणशीकराः ।
षष्टिरातपमेघानामेषा वृष्टिः समाहिता ॥
(५) वातमातपयोगं च विभजन् यत्र वर्षति ।
त्रीन् कर्षकांश्च जनयंस्तत्र सस्यागमो ध्रुवः ॥
(६) ततः प्रभूतोदकमल्पोदकं वा सस्यं वापयेत् ।
(७) शालिव्रीहिकोद्रवतिलप्रियङ्गुदारकवरकाः पूर्ववापाः । मुद्गमाषशैम्ब्या मध्यवापाः । कुसुम्भमसूरकुलत्थयवगोधूमकलायातसीसर्षपाः पश्चाद्वापाः ।
( १ ) वारिश के अनुपात से यदि एक हिस्सा श्रावण-कार्तिक में और दो हिस्सा भाद्रपद-आश्विन में पानी बरसे तो वह वर्ष फसल के लिए लाभदायी समझना चाहिए।
( २ ) अच्छे वर्ष के आसार इन बातों पर निर्भर हैं : जब बृहस्पति मेष राशि से वृष राशि पर संक्रमण करें, जब गर्भाधान अर्थात् मार्गशीर्ष आदि छह महीनों में कोहरा, वर्षा, बादल आदि देखे जांय, जब शुक्र ग्रह की उदयास्त गति आषाढ की पंचमी आदि नौ तिथियों में संचारित हो, और जब सूर्य के चारों ओर मंगल दिखाई दे, ये सभी अच्छी वर्षा के लक्षण है ।
( ३ ) यदि सूर्य के चारों ओर मंडल पड़ा हो तो अनाज के अच्छे दाने का अनुमान करना चाहिए । यदि बृहस्पति वृष राशि का हो तो अच्छी फसल का अनुमान करना चाहिए । यदि शुक्र की उदयास्त गति कारण हो तो अच्छी वृष्टि का अनुमान करना चाहिए ।
( ४ ) लगातार सात दिन में तीन बार वर्षा उत्तम है, सारी वर्षार्ऋतु में अस्सी बार बूंदों की वर्षा भी उत्तम है, यदि साठ बार धूप खिल कर फिर बार-बार वर्षा होती रहे तो वह वर्षा अति उत्तम मानी गई है ।
( ५ ) बीच-बीच में हवा के चलने और धूप के खिलने का अन्तर छोड़कर यदि वर्षा हो ओर तीन-तीन दिन हल चलाने का अवसर देकर यदि वर्षा हो तो उत्तम फसल होने का अनुमान करना चाहिए ।
( ६ ) वर्षा के अनुपात से ही बीज बोना चाहिए ।
( ७ ) साठी या धान ( शालि ), गेहूँ-जौ-ज्वार ( ब्रीहि ), कोदो, तिल, कांगनी ( प्रियंगु ) और लोभिया आदि को वर्षा शुरू होने के पहिले ही बो देना चाहिए । मूंग, उड़द और छीमी आदि को वर्षा के मध्य में बोना चाहिए । कुसुंबी, मसूर,