भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ४३ | अध्याय २७

गणिकाध्यक्षः

(१) गणिकाध्यक्षो गणिकान्वयामगणिकान्वयां वा रूपयौवनशिल्प-सम्पन्नां सहस्रेण गणिकां कारयेत् । कुटुम्बार्धेन प्रतिगणिकाम् ।

(२) निष्पतिताप्रेतयोर्दुहिता भगिनी वा कुटुम्बं भरेत । तन्माता वा प्रतिगणिकां स्थापयेत् । तासामभावे राजा हरेत् ।

(३) सौभाग्यालङ्कारवृद्ध्या सहस्रेण वारं कनिष्ठं मध्यममुत्तमं वारो-पयेत् । छत्रभृङ्गारव्यजनशिबिकापीठिकारथेषु च विशेषार्थम् ।

(४) सौभाग्यभङ्गे मातृकां कुर्यात् ।


वेश्यालयों का अध्यक्ष

(१) वेश्यालयों की व्यवस्था करने वाले राजकीय अधिकारी को चाहिए कि रूप, यौवन से सम्पन्न एवं गायन-वादन में निपुण स्त्री को, चाहे वह वेश्याकुल से संबद्ध हो या न हो, एक हजार पण देकर गणिका (वेश्या) के कार्य पर नियुक्त करे। इसी प्रकार दूसरी गणिकाओं को नियुक्त किया जाय, और एक सहस्र पण में से आधा उन्हें तथा आधा उनके परिवार को दे दिया जाय।

(२) यदि कोई गणिका दूसरी जगह चली जाय या मर जाय तो उसकी जगह उसकी लड़की या बहिन नियुक्त होकर परिवार का पोषण करे। अथवा उसकी माता उसकी जगह किसी दूसरी गणिका को नियुक्त करे। यदि ऐसा भी सम्भव न हो सके तो उसकी संपत्ति को राजा ले ले।

(३) वेश्याओं की तीन श्रेणियां हैं। १. कनिष्ठ, २. मध्यम और ३. उत्तम। सौन्दर्य तथा सजावट में कमसल कनिष्ठ वेश्या का वेतन एक हजार पण, सौन्दर्य तथा सजावट में उससे अच्छी मध्यम वेश्या का वेतन दो हजार पण, और हर एक बात में चतुर उत्तम वेश्या का वेतन तीन हजार पण होता है। कनिष्ठ वेश्या छत्र तथा इत्रदान लेकर राजा की सेवा करे, मध्यम वेश्या पालकी के साथ रहकर राजा को व्यजन करे, और उत्तम वेश्या राजसिंहासन तथा रथ आदि के निकट रह कर राजा की परिचर्या करे।

(४) जब गणिकाओं का सौन्दर्य जाता रहे और उनकी जवानी ढल जाय, तब उन्हें खाला (मातृका) के स्थान पर नियुक्त कर देना चाहिए।