कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २१७
(१) परचक्राटवीभयादनुप्रविष्टानां पशूनां पालनधर्मेण दशभागं दद्युरिति भागानुप्रविष्टकम् । (२) वत्सा वत्सतरा दम्या वहिनो वृषा उक्षाणश्च पुंगवा । (३) युगवाहनशकटवहा वृषभाः सूनामहिषाः पृष्ठस्कन्धवाहिनश्च महिषाः । (४) वत्सिका वत्सतरी प्रष्ठौही गर्भिणी धेनुश्चाप्रजाता बन्ध्याश्च गावो महिष्यश्च । मासद्विमासजातास्तासामुपजा वत्सा वत्सिकाश्च । मास-द्विमासजातानङ्कयेत् । मासद्विमासपर्युषितमङ्कयेत् । अङ्कं चिह्नं वर्णं शृङ्गान्तरं च लक्षणम्, एवमुपजा निबन्धयेदिति व्रजपर्यग्रम् । (५) चोरहृतमन्ययूथप्रविष्टमवलीनं वा नष्टम् ।
योग्य और बच्चों को खाने वाली ( पुत्रघ्नी ), इन पाँच प्रकार की गायों को भी पूर्ववत्, सौ बनाकर, किसी व्यक्ति को ठेके पर पालने के लिए दिया जाय । गोपालक को चाहिए कि वह स्थिति के अनुसार घी आदि का आधा या तिहाई हिस्सा मालिक को दे दिया करे; इस उपाय का नाम भग्नोट्सृष्टक है ।
( १ ) शत्रुओं अथवा चोरों के डर से जो गोपालक अपनी गायों को सरकारी चरागाह में ही बन्द करके रखे, उसको चाहिए कि वह, गायों की आमदनी का दसवाँ भाग राजा को अदा करे; गाय आदि की रक्षा के इस तौर-तरीके को भागानुप्रविष्टक कहते हैं ।
( २ ) दूध पीने वाला बछड़ा, बड़ा बछड़ा, कृषियोग्य बछड़ा ( दम्य ), बोझा ढोने योग्य साँड़ ( बहिनो ), बिना बधिया किया हुआ साँड़ और हल जोतने योग्य बैल, ये छह प्रकार के बैल होते हैं ।
( ३ ) जुवा, हल, गाड़ी आदि में जोते जाने योग्य भैंसा, साँड़ ( वृषभा ), मांस के उपयोग में आने वाले ( सूनामहिषा ) और बोझा ढोने योग्य, ये चार प्रकार के भैंसे होते हैं ।
( ४ ) दूध पीने वाली बछिया, पठोरी ( प्रष्ठौही ), गाभिन, दूध देने वाली, अधेड़ और बाँझ, ये सात प्रकार की गाय-भैंसें हैं । उनके दो महीने या एक महीने के पैदा हुए बछड़ों को उपजा ( लयेरू ) कहते हैं । उन लयेरू बछड़ों को लोहे के गर्म छल्लों से दाग देना चाहिए । दो मास तक सरकारी चरागाह में रहने वाली गाय-भैंसों को भी दाग देना चाहिए, उनके स्वामियों का पता लगे या न लगे । राजकीय मुहर अथवा छल्ले आदि से अङ्कित गाय-भैंसों तथा लयेरू बछड़ों के रङ्ग, सींग आदि विशेष चिह्नों का उल्लेख रजिस्टर में किया जाय । गायों की रक्षा के इस उपाय को व्रजपर्यग्र कहते हैं ।
( ५ ) नष्ट गोधन तीन प्रकार का होता है : १. चोरों द्वारा अपहृत २. दूसरे गोष्ठों में विलयित और ३. अपने गोष्ठ से भ्रष्ट; इसी अवस्था को नष्ट कहते हैं ।