कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) तेन गोमण्डलं खरोष्ट्रमहिषमजाविकं च व्याख्यातम् । (२) द्विरह्नः स्नानमश्वानां गन्धमाल्यं च दापयेत् । कृष्णसन्धिषु भूतेज्याः शुक्लेषु स्वस्तिवाचनम् ॥ (३) नीराजनामाश्वयुजे कारयेन्नवमेऽहनि । यात्रादाववसाने वा व्याधौ वा शान्तिके रतः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणेऽश्वाध्यक्षो नाम त्रिंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चाशः।
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पर करना चाहिए। यदि चिकित्सा और दवाई के दोष के कारण घोड़ा मर जाय तो जितनी कीमत का घोड़ा हो उतना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष पर किया जाय ।
( १ ) घोड़ों की परिचर्या और चिकित्सा के लिए ऊपर जो नियम बताये गये हैं, गाय, बैल, गधा, ऊँट, भैंस और भेड़-बकरियों को परिचर्या चिकित्सा के सम्बन्ध में भी वही नियम समझने चाहिए; इनके सम्बन्ध में भी वही दण्ड-व्यवस्था है ।
( २ ) शरद और ग्रीष्म, दोनों ऋतुओं में घोड़ों को दो-दो बार नहलाना चाहिये । गन्ध और मालाएँ उन्हें प्रतिदिन दी जानी चाहिए । अमावस्था को घोड़ों के निमित्त भूतों को बलि देनी चाहिए । और पूर्णमासी को उनके कुशल-क्षेम के लिये स्वस्तिवाचन पढ़ा जाना चाहिए ।
( ३ ) आश्विन मास की नवमी को घोड़ों के स्वस्थ-नीरोग रहने के लिये नीराजना संस्कार करना चाहिए । यात्रा के आगे और यात्रा की समाप्ति पर और घोड़ों में कोई संक्रामक रोग फैलने पर भी नीराजना संस्कार करना चाहिए ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अश्वाध्यक्ष नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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