भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ४९-५० : अ० ३३ ] सेनाध्यक्षों के कार्य २३७

कर्मस्वायोगं विद्यात् । आ कर्मभ्यश्च भक्तवेतनं भृतानामभृतानां च योग्या- रक्षानुष्ठानमर्थमानकर्म च ।

(१) एतेन पत्त्यध्यक्षो व्याख्यातः । स मौलभृतश्रेणिमित्रामित्राटवीब- लानां सारफल्गुतां विद्यात् । निम्नस्थलप्रकाशकूटखनकाकाशदिवारात्रियुद्ध- व्यायामं च विद्यात् । आयोगमयागं च कर्मसु ।

(२) तदेव सेनापतिः सर्वयुद्धप्रहरणविद्याविनीतो हस्त्यश्वरथचर्या- संघुष्टश्चतुरङ्गस्य बलस्यानुष्ठानाधिष्ठानं विद्यात् ।

(३) स्वभूमिं युद्धकालं प्रत्यनीकमभिन्नभेदनं भिन्नसन्धानं संहतभेदनं भिन्नवधं दुर्गवधं यात्राकालं च पश्येत् ।


वाला, रथ के घोड़े आदि के कार्यों की पूरी जानकारी रखे । रथाध्यक्ष का यह भी कर्तव्य है कि वह नियमित रूप से कार्य करने वाले तथा अस्थायी रूप से कार्य करने वाले कारीगरों एवं कर्मचारियों के उचित वेतन-भत्ता तथा निर्वाहयोग्य धन की व्यवस्था करे एवं उनका आदर-सत्कार करे ।

( १ ) पैदल सेना के अध्यक्ष के कार्य : रथ्याध्यक्ष के ही समान पत्त्यध्यक्ष की आरम्भिक कार्य-व्यवस्था को भी समझना चाहिए । इसके अतिरिक्त वह राजधानी की रक्षा करने वाली सेना ( मौलबल ), वेतनभोगी सेना ( भृतबल ), विभिन्न प्रदेशों में रखी गई सेना ( श्रेणिबल ), मित्रराजा की सेना ( मित्रबल ), शत्रुराजा की सेना ( अमित्रबल ) और जङ्गल की सुरक्षा के लिये नियुक्त सेना ( अटवीबल ) के सामर्थ्य-असामर्थ्य की पूरी जानकारी रखे । इसके अतिरिक्त वह, जङ्गल, तराई, मोर्चबंदी, छल-कपट, खाई, हवाई, दिन और रात आदि सभी प्रकार के युद्धों की जानकारी प्राप्त करे । देश-काल की दृष्टि से सेनाओं की उपयोगिता और अनुपयोगिता का भी वह ज्ञान रखे ।

( २ ) सेनापति के कार्य : सेनापति को चाहिये कि वह अश्वाध्यक्ष से लेकर पत्त्यध्यक्ष तक के सम्पूर्ण कार्य-व्यापार को भली भांति समझे, सेनापति को हर प्रकार के युद्ध करने, हथियार चलाने और आन्वीक्षिकी आदि शास्त्रों में पारंगत होना चाहिए, हाथी, घोड़े और रथ चलाने की भी पूरी योग्यता उसमें होनी चाहिए, चतुरङ्गिणी सेना के कार्य और स्थान की भी उसे पूरी जानकारी होनी चाहिए ।

( ३ ) इसके अतिरिक्त उसमें, अपनी भूमि, युद्धकाल, शत्रुसेना, शत्रुव्यूह का तोड़ना, बिखरी हुई सेना को समेटना, बिखरी हुई शत्रुसेना का मर्दन करना, दुर्ग तोड़ना और उचित समय पर युद्ध के लिये प्रस्थान करना, इन सभी बातों को समझने-करने की पूरी क्षमता होनी चाहिए ।