कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अनुदके कूपसेतुबन्धोत्सान् स्थापयेत्, पुष्पफलवाटांश्च। (२) लुब्धकश्वगणिनः परिव्रजेयुररण्यानि। तस्करामित्राभ्यागमे शंखदुन्दुभिशब्दमग्राह्याः कुर्युः शैलवृक्षाधिरूढा वा शीघ्रवाहना वा। (३) अमित्राटवीसंचारं च राज्ञो गृहकपोतैर्मुद्रायुक्तैर्हारयेयुः धूमाग्निपरम्परया वा। (४) द्रव्यहस्तिवनाजीवं वर्तनीं चोररक्षणम्।
सार्थातिवाह्यं गोरक्ष्यं व्यवहारं च कारयेत्॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्षो नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः, आदितश्चतुष्पञ्चाशः।
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(१) जिस जगह पानी का अभाव हो वहाँ पक्के कुयें, पक्के तालाव, फूल तथा फलों के बगीचे और प्याऊ आदि की व्यवस्था की जाय।
(२) शिकारी और बहेलिये निरन्तर जंगलों में घूमते रहें। उन्हें चाहिए कि वे चोर या शत्रुओं के आने की सूचना पहाड़ पर या वृक्ष पर चढ़कर अथवा शंख-दुन्दुभी बजाकर अन्तपाल को पहुँचायें, अथवा शीघ्रगामी घोड़ों पर चढ़कर वे इस सूचना को अन्तपाल तक पहुँचावें।
(३) यदि जंगल में शत्रु आ जांय तो मुहर लगे पालतू कबूतरों के द्वारा उसका समाचार राजा तक पहुँचाया जाय, यदि रात को शत्रु जंगल में प्रवेश करें तो आग जलाकर और दिन में धुआँ लुङ्ग करके सूचित करें।
(४) विवीताध्यक्ष का कार्य है कि वह द्रव्यवनों और हस्तिवनों के घास, लकड़ी तथा कोयले आदि का भी प्रबन्ध करें, दुर्ग के रास्ते जाने का टैक्स, चोरों से की हुई रक्षा का टैक्स, गोरक्षा का टैक्स तथा इन सभी वस्तुओं के खरीद-फरोख्त का प्रबन्ध भी विवीताध्यक्ष ही करवाये।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में मुद्राध्यक्ष-विवीताध्यक्ष नामक चौतीसवाँ अध्याय समाप्त।
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