कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ५५ | नागरिकप्रणिधिः अध्याय ३६ |
(१) समाहर्तृवन्नागरिको नगरं चिन्तयेत्, दशकुलीं गोपो, विंशतिकुलीं चत्वारिंशत्कुलीं वा । स तस्यां स्त्रीपुरुषाणां जातिगोत्रनामकर्मभिः जङ्घाग्रमायव्ययौ च विद्यात् । (२) एवं दुर्गचतुर्भागं स्थानिकश्चिन्तयेत् । (३) धर्मवसथिनः पाषण्डिपथिकानावेद्य वासयेयुः । स्वप्रत्ययाश्च तपस्विनः श्रोत्रियांश्च । (४) कारुशिल्पिनः स्वकर्मस्थानेषु स्वजनं वासयेयुः । वैदेहकाश्चान्योन्यं स्वकर्मस्थानेषु । पण्यानामदेशकालविक्रेतारमस्वकरणं च निवेदयेयुः । (५) शौण्डिकपाक्वमांसिकौदनिकरूपाजीवाः परिज्ञातमावासयेयुः । अतिव्ययकर्तारमत्याहितकर्माणं च निवेदयेयुः ।
नागरिक के कार्य
( १ ) समाहर्त्ता की तरह नागरिक अधिकारी भी नगर के प्रबन्ध की चिन्ता करे । उत्तम दस कुलों, मध्यम बीस कुलों और अधम चालीस कुलों का प्रबन्ध गोप नामक अधिकारी करे । उन कुलों के स्त्री-पुरुषों के वर्ण, गोत्र, नाम, कार्य, उनकी संख्या और उनके आय-व्यय के सम्बन्ध के वह भली भाँति जाने ।
( २ ) इसी प्रकार दुर्ग के चौथे हिस्से का प्रबन्ध, अर्थात् दुर्ग में रहने वाले स्त्री-पुरुषों के सम्बन्ध में उक्त जानकारी स्थानिक नामक अधिकारी प्राप्त करे ।
( ३ ) धर्मशाला के प्रबन्धक को चाहिए कि वह, धूर्त-पाखण्डी मुसाफिरों को गोप की अनुमति से ही टिकाये, किन्तु जिन तपस्वियों या श्रोत्रियों को वह स्वयं जानता है, उन्हें अपनी जिम्मेदारी पर भी टिका सकता है ।
( ४ ) मोटे तथा महीन कार्य को करने वाले सुपरिचित एवं विश्वस्त कारीगर को अपने कार्य करने के स्थानों में ठहराया जा सकता है । व्यापारी लोग अपने जान-पहचान वाले व्यापारियों को अपनी-अपनी दूकानों में ठहरा सकते हैं, किन्तु देश-काल के विपरीत व्यापार करने वाले या दूसरे के सामान को अपने व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति की सूचना नागरिक को कर देनी चाहिए ।
( १ ) मद्य-मांस बेचने वाले, होटल वाले और वेश्यायें अपने-अपने परिचितों