भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 334
२५०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) नित्यमुदकस्थानमार्गभूमिच्छन्नपथवप्रप्राकाररक्षावेक्षणं नष्टप्रस्मृतापसृतानां च रक्षणम् । (२) बन्धनागारे च बालवृद्धव्याधितानाथानां जातनक्षत्रपौर्णमासीषु विसर्गः । पुण्यशीलाः समयानुबद्धा वा दोषनिष्क्रयं दद्युः । (३) दिवसे पञ्चरात्रे वा बन्धनस्थान् विशोधयेत् । कर्मणा कायदण्डेन हिरण्यानुग्रहेण वा ॥ (४) अपूर्वदेशाधिगमे युवराजाभिषेचने । पुत्रजन्मनि वा मोक्षो बन्धनस्य विधीयते ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नागरिकप्रणिधिर्नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः, आदितः षट्पञ्चाशः ।

समाप्तमिदमध्यक्षप्रचारो नाम द्वितीयमधिकरणम् ।

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यदि कोई नगरवासी अध्यक्ष को न पहुँचावे तो अपराध के अनुसार उसके लिए दण्ड नियत होना चाहिए । उन पहरेदारों को भी उनके अपराध के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए, जिन्होंने पहरा देने में किसी प्रकार का प्रमाद किया हो ।

(१) नगर-अधिकारी ( नागरिक ) को चाहिए कि वह जल-स्थल मार्ग, सुरंग मार्ग, सफील, परकोटा, खाई तथा बुर्ज आदि की अच्छी तरह देख-भाल करें, और उन सभी खोये हुए, भूले हुए, छूटे हुए, आभूषण, सामान या प्राणियों को तब तक अपने संरक्षण के रखे, जब तक कि उनके असली मालिक का पता न लग जाय ।

(२) जेल में बन्द हुए बूढे, बच्चे बीमार और अनाथ कैदियों को राजा की वर्ष गांठ आदि अच्छे उत्सवों या पूर्णिमा आदि पर्वों पर छोड़ देना चाहिए । धोखे में यदि कोई धर्मात्मा पुरुष अपराधी बनाकर कैद में डाला गया हो तथा ऐसे व्यक्ति, जो भविष्य में अपराध न करने की प्रतिज्ञा करते हों, उन्हें अपराध के बदले में धन लेकर छोड़ देना चाहिए, उन्हें फिर जेल में न रखा जाना चाहिए ।

(३) प्रतिदिन या प्रति पाँचवें दिन, ऐसा नियम बना दिया जाय कि उस दिन धन लेकर, शारीरिक दण्ड देकर या कार्य कराकर ( निष्क्रय ) कुछ कैदी छोड़ दिये जांय । धनदण्ड, शारीरिक दण्ड या कार्यदण्ड, इन तीनों में से जो कैदी आसानी से जिस दण्ड को भुगत सके वही दण्ड उसको दिया जाय ।

(४) किसी नये देश की जीतने पर, युवराज का राज्याभिषेक होने पर और राजपुत्र के जन्मोत्सव पर कैदियों को छोड़ देना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नागरिकप्रणिधि नामक छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त ।