कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२ )
कंबोह के तट पर ) था। अशोक के शिलालेखों में उनका उल्लेख गांधारों के बाद आया है ( पाँचवां अभिलेख ) । पाणिनि ने कांबोजों का उल्लेख किया है ( अष्टाध्यायी ४।१।१७५ ), जिससे प्रतीत होता है कि कांबोजों में जो राजा होता था वह एकराज होता था अथवा निर्वाचित शासक होता था। कौटिल्य के समय में कांबोजों की शासन-व्यवस्था, पाणिनि के दृष्टिकोण की अपेक्षा सर्वथा बदली हुई दिखाई देती है। कांभोज का शब्दार्थ है : निकृष्ट भोज । कांबोज भी उसका पर्याय है।
यास्क ( ७०० ई० पूर्व ) के कथनानुसार कांभोजों की मातृभाषा संस्कृत थी; किन्तु उनकी भाषा में पड़ोसी ईरानियों की भाषा के रूप मिल गये थे ( निरुक्त २।१।३।४ ) ।
सुराष्ट्र : सुराष्ट्र लोग काठियावाड़ के निवासी थे । वलभी के ५८ ई० पूर्व के शिलालेखों ( जिनका प्रामाणिक वंशक्रम डा० जायसवाल ने तैयार किया है, देखिए जे० बी० ओ० आर० एस०, १, १०१; १९१४; एपिग्रफिया इण्डिका, भाग ८, पृ० ४४ ) और रुद्रदामन् के जूनागढ़ वाले शिलालेखों ( एपिग्राफिया इण्डिका, भाग ८, पृ० ६० ), जिनकी स्थिति दूसरी शताब्दी ई० की है, से विदित होता है कि सुराष्ट्र लोग मौर्य-साम्राज्य के बाद भी बने रहे । किन्तु दूसरी शताब्दी ई० के लगभग उनके संघटन का महत्त्व लोप हो गया था; उसके बाद उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व न रह गया था ( हिन्दू-राजतंत्र १, पृ २१६ ) ।
क्षत्रिय : श्रेणी : क्षत्रियों और श्रेणियों के संबंध में कहा गया है कि ये सिंध के रहने वाले, एक-दूसरे के पड़ोसी थे एरियन, भाग ६, प्रकरण १५ ) । यूरोपीय विद्वानों ने क्षत्रियों को एक विशिष्ट उपजाति ( Xathroi ) कहा है किन्तु अर्थशास्त्र से विदित होता है कि वह नाम एक विशिष्ट राजनीतिक संघ का था । श्रेणियों के लिए भिन्न-भिन्न नाम दिये गये हैं ( ऐश्येंट इण्डिया, इट्स इन्वेजन बाई अलेक्जेंडर दि ग्रेट, पृ. ३६७ ) । ऐसा प्रतीत होता है कि श्रेणी लोग कई उपवर्गों में विभाजित थे और जिन श्रेणियों से सिकन्दर की मुठभेड़ हुई थी वे अग्र या प्रथम श्रेणी थे । आधुनिक सिंधी खत्री, प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं ।
अग्र श्रेणियों के संबंध में कहा गया है कि वे बड़े वीर थे । अपनी पराजय के समय उन्होंने अपने स्त्री-बच्चों को उसी प्रकार आग में जला डाला था जैसे जोहर के समय राजपूत अपने स्त्री-बच्चों को जला डालते थे ( कर्टियस, भाग ९