कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ७० : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१७
मन्यथाकरणे वा नासकामः कृतमनुमन्येत । सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं न मोघं कुर्यात् । (१) तेन संघभृता व्याख्याताः । तेषामाधिः सप्तरात्रमासीत । ततोऽन्यमुपस्थापयेत्; कर्मनिष्पाकं च । न चानिवेद्य भर्तुः संघः कंचित्परिहरेदुपनयेद्वा । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । संघेन परिहृतस्यार्धदण्डः । इति भृतकाधिकारः । (२) सघंभृताः सम्भूयसमुत्थातारो वा यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् । (३) कर्षकवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसानान्तरे सन्नस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दद्युः । पुरुषोपस्थाने समग्रमंशं दद्युः । संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यंशं दद्युः । सामान्या हि पथि सिद्धिश्चासिद्धिश्च ।
कराके फिर न कराये तो नौकर का पूरा काम किया हुआ समझा जाय । मालिक के आज्ञानुसार ठीक स्थान और समय पर काम न करने से या कार्यों को उलटा कर देने से नौकर काम किया हुआ न समझा जाय । मालिक जितना काम बताये नौकर यदि उससे अधिक कार्य कर डाले तो वह अतिरिक्त मेहनत व्यर्थ समझनी चाहिए ।
( १ ) मिल, कारखाना और कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी यही नियम समझना चाहिए । ठीक तरह से कार्य न करने वाले मजदूरों की सात दिन की मजदूरी दबाये रखनी चाहिए, इतने पर भी यदि वे ठीक तरह से कार्य न करें तो वह कार्य दूसरे को दे देना चाहिए, और उस कार्य को ठीक कराकर दूसरे को उचित मजदूरी दे देनी चाहिए । मजदूरों को चाहिए कि मालिक को बिना सूचित किये वे न तो किसी वस्तु को नष्ट करें और न ले जाँय । इस नियम का उल्लंघन करने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय यदि सभी मजदूर मिलकर ऐसा करें तो उनको आधा दण्ड दिया जाय । यहाँ तक मजदूरों ( भृतकों ) के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( २ ) संघ से एक मुष्ट मजदूरी पाने वाले या मिलकर ठेके आदि पर काम करने वाले मजदूर पहले से तय की हुई मजदूरी आपस में बराबर-बराबर बांट लें ।
( ३ ) किसान को चाहिए कि वह फसल के आरम्भ से अन्त तक और खरीद-फरोख्त करने वाले व्यापारी को चाहिए कि माल खरीदने से लेकर बेचने तक वे अपने साझीदार को उसके कार्य के अनुसार हिस्सा दें । यदि कोई साझीदार अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को नियत कर दे तब भी उसका पूरा हिस्सा दिया जाय, माल बिक जाने पर दुकान उठने से पहिले ही साझीदार को उसका हिस्सा भी दिया जाय; क्योंकि आगे कार्य करने सफलता और असफलता समान है ।