कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ७१ : अ० १५ ] क्रय विक्रय का बयाना ३२१
(१) विवाहानां तु त्रयाणां पूर्वेषां वर्णानां पाणिग्रहणासिद्धमुपावर्तनम् । शूद्राणां च प्रकर्मणः । वृत्तपाणिग्रहणयोरपि दोषमौपशायिकं दृष्ट्वा सिद्धमुपावर्तनम् । न त्वेवाभिप्रजातयोः ।
(२) कन्यादोषमौपशायिकमनाख्याय प्रयच्छतः षण्णवतिर्दण्डः । शुल्कस्त्रीधनप्रतिदानं च ।
(३) वरयितुर्वा वरदोषमनाख्याय विन्दतो द्विगुणः । शुल्कस्त्रीधननाशश्च ।
(४) द्विपदचतुष्पदानां तु कुष्ठव्याधिताशुचीनामुत्साहस्वास्थ्यशुचीनामाख्याने द्वादशपणो दण्डः ।
(५) आ त्रिपक्षादिति चतुष्पदानामुपावर्तनम् । आ संवत्सरादिति मनुष्याणाम् । तावता हि कालेन शक्यं शौचाशौचे ज्ञातुमिति ।
उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि दोष, उपनिपात और अविषह्य आदि कारणों से ऐसा किया गया हो तो खरीदार निर्दोष है । खरीदने वाले के लिए भी बयाना देने का वही नियम है, जो बेचने वाले के लिए बताया गया है ।
( १ ) विवाह सम्बन्धी शर्तें : ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, इन तीनों जातियों में विवाह के बाद स्त्री पुरुष के किसी प्रकार का उलट-फेर नहीं हो सकता है । शूद्रों में प्रथम संयोग हो जाने पर स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को छोड़ सकते हैं । ब्राह्मण आदि तीन वर्णों में विवाह के बाद सुहागरात के समय यदि पति-पत्नि को एक-दूसरे में कोई योनिलिङ्ग दोष जान पड़े तो सम्बन्ध-विच्छेद हो सकता है । सन्तान हो जाने पर किसी भी तरह सम्बन्ध-विच्छेद सम्भव नहीं है ।
( २ ) कन्या के किसी गुप्त दोष को छिपाकर उसका विवाह करने वाले व्यक्ति पर छियानबे पण दण्ड किया जाय और उसे जो शुल्क तथा स्त्री धन दिया है वह वापिस लिया जाय ।
( ३ ) इसी प्रकार जो वर के दोषों को छिपा कर विवाह करता है, उस पर दुगुना अर्थात् १९२ पण दण्ड किया जाय और उसको दिया हुआ शुल्क तथा स्त्री धन भी जब्त कर लिया जाय ।
( ४ ) पशुओं की विक्री : कोढी, बीमार तथा व्यधिग्रस्त मनुष्यों और पशुओं को स्वस्थ-सुंदर बताने वाले व्यक्ति पर बारह पण जुर्माना किया जाय ।
( ५ ) चौपाये पशु डेढ मास तक और मनुष्य साल भर तक लौटाये जा सकते हैं क्योंकि इस अवधि में इनकी अच्छाई-बुराई का भली भांति अन्दाजा लगाया जा सकता है ।
२१ कौ०