कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ७६
अध्याय १
कारुकरक्षणम्
(१) प्रदेष्टारस्त्रयस्त्रयोऽमात्याः कण्टकशोधनं कुर्युः ।
(२) अर्थ्यप्रकाराः कारुशासितारः सन्निक्षेप्तारः स्ववित्तकारवः श्रेणीप्रमाणा निक्षेपं गृह्णीयुः । विपत्तौ श्रेणी निक्षेपं भजेत । निर्दिष्टदेशकालकार्यं च कर्म कुर्युः । अनिर्दिष्टदेशकालकार्यापदेशम् ।
(३) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । अन्यत्र भ्रेशोपनिपाताभ्यां नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेयुः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशस्तद्द्विगुणश्च दण्डः ।
शिल्पियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) सामान्य कारीगर : तीन कमिश्नर ( प्रदेष्टा ) या तीन मंत्री प्रजा-पीड़क व्यक्तियों से प्रजा की रक्षा ( कंटक शोधन ) करें ।
( २ ) अच्छे स्वभाववाले शिल्पियों के मुखिया; सबके सामने लेन-देन का कार्य करने वाले; अपने ही धन से गहने आदि बनाने वाले और साझीदारों में विश्वसनीय, शिल्पी लोग ही किसी के धन को गिरवी ( निक्षेप ) रख सकते हैं । गिरवी रखने वाला यदि मर जाय या विदेश चला जाय तो उसके साझीदार मिल-जुल कर उस गिरवी रखे हुए धन को अदा करें । कारीगर लोग स्थान, समय और कार्य आदि का निश्चय करके ही किसी कार्य को आरम्भ करें । कोई बहाना बनाकर समय और कार्य आदि का निश्चय न करके किसी कार्य को आरंभ न करें ।
( ३ ) जो शिल्पी ठीक समय पर काम पर हाजिर न हों उनका चौथाई वेतन काट लिया जाय और उन पर उससे दुगुना जरमाना किया जाय । किन्तु किसी हिंसक प्राणी द्वारा बाधा उत्पन्न हो जाने या किसी आकस्मिक आपत्ति के आ जाने के कारण यदि वह ठीक समय से काम पर हाजिर न हो सका हो तो उसे अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर से कोई कार्य बिगड़ जाय तो वह उसके नुकसान को भरे; किन्तु किसी विपत्ति के कारण यदि ऐसा हुआ हो तो उसको अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर काम बिगाड़ दें तो उनको मजदूरी न दी जाय; बल्कि उन पर वेतन का दुगुना जरमाना किया जाय ।