कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
द्वादशपणो दण्डः, विरूपं चतुर्विंशतिपणः, चोरहस्तादष्टचत्वारिंशत्पणः । प्रच्छन्नविरूपमूल्यहीनक्रयेषु स्तेयदण्डः । कृतभाण्डोपधौ च । (१) सुवर्णान्माषकमपहरतो द्विशतो दण्डः । रूप्यधरणान्माषकमपहरतो द्वादशपणः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (२) वर्णोत्कर्षमसारणां योगं वा साधयतः पञ्चशतो दण्डः । तयोरपचरणे रागस्यापहारं विद्यात् । (३) माषको वेतनं रूप्यधरणस्य । सुवर्णस्याष्टभागः । शिक्षाविशेषेण द्विगुणा वेतनवृद्धिः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (४) ताम्रवृत्तकंसवैकृन्तकारकूटानां पञ्चकं शतं वेतनम् । ताम्रपिण्डो दशभागक्षयः । पलहीने हीनद्विगुणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
से, सोने-चाँदी के बने हुए जेवर ( सरूप ); सुवर्णाध्यक्ष को सूचित किए बिना ही खरीद ले तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; यदि बिना गहने की सोना-चाँदी खरीदे तो चौबीस पण; चोर के हाथ से खरीदे तो अठतालीस पण और दूसरों से छिपाकर गहने आदि को तोड़-मरोड़ कर थोड़ी कीमत में खरीदे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय । बनाये हुए माल को बदल देने वाले सुनार को भी चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि सुनार सोने में से एक माष सोना चुरा ले तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि एक धरण चाँदी में से एक माष चाँदी चुरा ले तो उस पर बारहपण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक चोरी के अनुसार अधिकाधिक दण्ड की व्यवस्था समझ लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई सुनार खोटे सोने-चाँदी पर नकली रंग चढ़ा दे या शुद्ध सोना-चाँदी में नकली धातु मिला दे तो उस पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । सोने-चाँदी के खरे-खोटे की जाँच आग में तपाकर करनी चाहिए ।
( ३ ) एक धरण मान चाँदी के गहने आदि की बनवाई एक माषक दी जानी चाहिए । जितने तौल की सोने की चीज बनवायी जाय उसका आठवां हिस्सा बनवाई देनी चाहिए । विशेष कारीगरी के लिए दुगुनी बनवाई देनी चाहिए । इसी के अनुसार अधिक कार्य करवाने की मजदूरी समझनी चाहिए ।
( ४ ) ताँबा, सीसा, काँसा, लोहा, रांगा और पीतल इनकी बनवाई पांच प्रति सैकड़ा दी जानी चाहिए । ताँबे का दसवाँ हिस्सा, बनाते समय छीजन के लिए छोड़ देना चाहिए । इससे एक पल भी कम हो जाने पर नुकसान का दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार अधिक हानि के अनुपात से दण्ड का विधान समझना चाहिए ।