भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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३५४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

(१) तुलामानान्तरमर्घवर्णन्तरं वा । धरकस्य मायकस्य वा पणमूल्या-दष्टभागं हस्तदोषेणाचरतो द्विशतो दण्डः । तेन द्विशतोत्तरा दण्डवृद्धि-र्व्याख्याता ।

(२) धान्यस्नेहक्षारलवणगन्धभैषज्यद्रव्याणां समवर्णोपधाने द्वादश-पणो दण्डः ।

(३) यन्निस्सृष्टमुपजीवेयुः, तदेषां दिवससञ्जातं सङ्ख्याय वणिक् स्थापयेत् । क्रेतृविक्रेतोरन्तरपतितमदायादन्यं भवति । तेन धान्यपण्य-निचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः । अन्यथानिश्चितमेषां पण्याध्यक्षो गृह्णीयात् । तेन धान्यपण्यविक्रये व्यवहरेतानुग्रहेण प्रजानाम् ।

(४) अनुज्ञातक्रयादुपरि चैषां स्वदेशीयानां पण्यानां पञ्चकं शतमाजीवं स्थापयेत् । परदेशीयानां दशकम् । ततः परमर्घं वर्धयतां क्रये विक्रये वा भावयतां पणशते पञ्चपणाद् द्विशतो दण्डः । तेनार्घवृद्धौ दण्डवृद्धिर्व्या-ख्याता ।


( १ ) तुला, बाट और मूल्य में अन्तर हो जाने के कारण जो लाभ हो उसे बही-खाते में दर्ज कर लिया जाय । तोलने वाला या मापने वाला अपने हाथ की सफाई से यदि एक पण मूल्य की वस्तु में आठवाँ हिस्सा कम कर दे तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिक हिस्सा कम कर देने पर अधिक दण्ड की व्यवस्था की जाय ।

( २ ) अनाज, तेल, खार, नमक, गन्ध और दवाइयों में कम कीमत की वस्तुओं को मिलाकर बेचने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय ।

( ३ ) दूकानदारों को प्रतिदिन जितना लाभ हो उसे बाजार का चौधरी (संस्था-ध्यक्ष) अपनी बही में गिनकर दर्ज कर ले । जिस वस्तु की खरीद-फरोख्त की व्यवस्था संस्थाध्यक्ष स्वयं करता है उसका लाभ राजकोष में जमा किया जाय । इस दृष्टि से व्यापारियों को उचित है कि वे संस्थाध्यक्ष की आज्ञा से ही धान्य आदि विक्रेय वस्तुओं का संचय करें । अनुमति न लेने पर संस्थाध्यक्ष को अधिकार है कि वह अनधिकृत वस्तुओं को अपने कब्जे में कर ले । संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह संगृहीत वस्तुओं के बिकने की ऐसी सुव्यवस्था करे, जिससे प्रजा का उपकार होता रहे ।

( ४ ) संस्थाध्यक्ष जिन वस्तुओं को बेचने की अनुमति दे, यदि वे वस्तुएँ स्वदेशी हों तो, उन पर व्यापारी नियत मूल्य से प्रति सैकड़ा पाँच पण लाभ ले सकता है । यदि वे विदेशी हों तो प्रति सैकड़ा दस पण लाभ ले । इससे अधिक मूल्य बढ़ाने तथा अधिक लाभ लेने पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक लाभ पर अधिकाधिक दण्ड दिया जाय ।