भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 481

प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से सम्भोग का दण्ड ३९७

भुञ्जीत स्त्रियमन्येषां यथासम्भाषितं नरः । न तु राजप्रतापेन प्रमुक्तां स्वजनेन वा ॥ न चोत्तमां न चाकामां पूर्वापत्यवतीं न च । ईदृशीं त्वनुरूपेण निष्क्रयेणापवाहयेत् ॥

इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कन्याप्रकर्म नाम द्वादशोऽध्यायः, आदितोऽष्टाशीतितमः ।

—: ० :—


परित्यक्ता रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों को, उद्धार करने वाला व्यक्ति, भोग सकता है; किन्तु राजाज्ञा या स्वजनों से त्यक्त, कुलीन, कामनारहित और बाल-बच्चों वाली स्त्रियों का, आपत्ति से बचाने पर भी; उपभोग नहीं किया जा सकता है; प्रत्युत उचित पुरस्कार प्राप्त कर ऐसी स्त्रियों को उनके घर पहुँचा दिया जाय ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कन्याप्रकर्म नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—