कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१५
(१) सकृदेव न द्विः प्रयोज्यः । तस्याकरणे वा समाहर्ता कार्यमपदिश्य पौरजानपदान् भिक्षेत । योगपुरुषाश्चात्र पूर्वमतिमात्रं दद्युः । एतेन प्रदेशेन राजा पौरजानपदान् भिक्षेत । कापटिकाश्चैनानल्पं प्रयच्छतः कुत्सयेयुः । सारतो वा हिरण्यमाढ्यान् याचेत ।
(२) यथोपकारं वा स्ववशा वा यदुपहरेयुः । स्थानच्छत्रवेष्टनविभूषाश्चैषां हिरण्येन प्रयच्छेत् । पाषण्डसंघद्रव्यमश्रोत्रियभोग्यं देवद्रव्यं वा कृत्यकराः प्रेतस्य दग्धगृहस्य वा हस्ते न्यस्तमित्युपहरेयुः ।
(३) देवताध्यक्षो दुर्गराष्ट्रदेवतानां यथास्वमेकस्थं कोशं कुर्यात् । तथैव चाहरेत् । दैवतचैत्यं, सिद्धपुण्यस्थानभौमवादिकं वा रात्रावुत्थाप्य यात्रासमाजाभ्यामाजीवेत् । चैत्योपवनवृक्षेण वा देवताभिगमनमनातर्वपुष्पफलयुक्तेन ख्यापयेत् । मनुष्यकरं वा वृक्षे रक्षोभयं रूपयित्वा सिद्धव्यञ्जनाः
( १ ) राज्यकर एक बार ही लेना चाहिए, दुबारा नहीं । यदि एक वार कर लेने में खजाने को न बढ़ाया जा सके तो समाहर्त्ता को चाहिए कि किसी कार्य का बहाना बनाकर वह नगरवासियों और प्रदेशवासियों से धन की याचना करे । इस योजना में मिले हुए लोग जनता को दिखाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा धन दें । इसी बहाने से राजा अपनी प्रजा से धन की याचना करे । यदि कोई थोड़ा धन दे तो राजा के गुप्तचर उसकी निंदा समाज में फैलायें । धनी व्यक्तियों से उनकी हैसियत के अनुसार धन लिया जाय ।
( २ ) राज्य की ओर से उपकृत लोगों पर उपकार के अनुपात से या जितना धन मिले हुए लोग दें, उतनी ही रकम देने को धनवानों से आग्रह किया जाय । और इस प्रकार उन सहायता देने वाले धनी पुरुषों को अधिकार, उच्चासन, छत्र, वेष्टन ( पगड़ी ) तथा आभूषण आदि देकर संमानित किया जाय । किसी पाखंडी या पाखंडी समूह की सम्पत्ति को तथा उस मन्दिर की सम्पति को जिसका कोई भी अंश श्रोत्रिय के पास नहीं जाता है तथा मरे हुए एवं घर जले हुए की सम्पत्ति को, उनका कर्म कराने के बहाने, राजकोष में जमा कर लिया जाय ।
( ३ ) देवताध्यक्ष ( देव मन्दिरों का अधिकारी ) को चाहिए कि वह दुर्ग तथा राष्ट्र के देवमन्दिरों की आमदनी को एक स्थान पर जमा करके रखे । उसको फिर राजा को दे दे । किसी प्रसिद्ध पवित्र स्थान में 'भूमि को फाड़ कर देवता प्रकट हुआ है' ऐसी अफवाह फैलाकर रात में वहाँ देवता की एक वेदी बनवा दी जाय और मेला लगवा कर यात्रियों तथा दर्शकों से वहाँ खूब भेंट चढ़वाई जाय, उसको राजा ले ले । बिना मौसम किसी मन्दिर या उपवन में किसी पेड़ पर फल या फूल पैदा कराके यह प्रसिद्धि करवा दी जाय कि वह तो देव-महिमा है । अथवा सिद्धों के वेष में घूमने