भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३१

(१) तत्रस्थो दोषनिर्घातं मित्रैर्भर्तरि चाचरेत् ।
ततो भर्तरि जीवेद् वा मृते वा पुनराव्रजेत् ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे समयाचारिकं नाम पञ्चमोऽध्यायः,
आदितः पञ्चनवतितमः ।

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( १ ) राजा के पास रहते हुए ही उसके मित्रों द्वारा अपने अपराध की सफाई करानी चाहिए और तब राजा के प्रसन्न हो जाने पर उसके आश्रय में बना रहना चाहिए या जब उसकी मृत्यु हो जाय तब वापिस आना चाहिए ।

योगवृत्त नामक चतुर्थ अधिकरण में समयाचारिक नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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