कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३३
(१) यस्माच्च सामन्तादाबाधं पश्येत्, तमुत्सवविवाहहस्तिबन्धनाश्व-पण्यभूमिप्रदानापदेशेन अवग्राहयेत्। स्वमित्रेण वा। ततः सन्धिमदूष्यं कारयेत्।
(२) आटविकामित्रैर्वा वैरं ग्राहयेत्। तत्कुलीनमवरुद्धं वा भूम्येक-देशेनोपग्राहयेत्।
(३) कुल्यकुमारमुख्योपग्रहं कृत्वा वा कुमारमभिषिक्तमेव दर्शयेत्। दाण्डकर्मिकवद् वा राज्यकण्टकानुद्धृत्य राज्यं कारयेत्।
(४) यदि वा कश्चिन्मुख्यः सामन्तादीनामन्यतमः कोपं भजेत्, तम् ‘एहि राजानं त्वा करिष्यामि’ इत्यावाहयित्वा घातयेत्। आपत्प्रतीकारेण वा साधयेत्।
(५) युवराजे वा क्रमेण राज्यभारमारोप्य राजव्यसनं ख्यापयेत्।
लेकर राजा के विरुद्ध हो जाय तो उसे किसी उपाय से अपने अनुकूल बनाया जाय। अथवा उस समय उसे किसी बाधाबहुल युद्ध में भेज दिया जाय। अथवा सहायता माँगने के बहाने किसी मित्र राजा के पास भेज दिया जाय।
( १ ) यदि किसी समीप के सामन्त राजा से बाधा का भय हो तो उसे उत्सव, विवाह, हाथी, घोड़ा, अन्य माल या भूमि देने के बहाने अपने पास बुलाकर अपने अनुकूल बना लिया जाय। अथवा अपने मित्र के द्वारा ही उसको अनुकूल बनाया जाय और तब उसके साथ निर्वैर ( अदूष्य ) संधि कर ले।
( २ ) अथवा उस सामंत को आटविक तथा अपने शत्रु के साथ लड़ा दे। अथवा उस सामंत-परिवार के किसी व्यक्ति को भूमि देकर अपने वश में कर ले और फिर उसके द्वारा सामन्त का दमन कराये।
( ३ ) राजा के मर जाने के बाद अमात्य को चाहिए कि वह राज-परिवार के कुमार और राज्य के प्रमुख कर्मचारियों की अनुकूल स्थिति को देखकर अभिषिक्त राजकुमार को ही प्रजा के सामने खड़ा करे, वह दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से राज्य के विरोधियों का निर्मूल कर निष्कंटक राज्य करे।
( ४ ) यदि सामंतमुख्यों में से कोई एक इस बात से कुपित हो जाय तो उससे 'यह बालक तो राज्य के लिए सर्वथा अयोग्य है, आप यहाँ आवें, आपको ही मैं राजा बना दूँगा' ऐसा कह कर अपने यहाँ बुलाया जाय और फिर उसका वध करा दिया जाय। यदि वह आये नहीं तो आपत्प्रतीकार प्रकरण में निर्दिष्ट तरीकों से उसको सीधा किया जाय।
( ५ ) युवराज पर धीरे-धीरे राज्य का भार सौंप कर फिर राजा की विपत्ति को सबके सामने प्रकट करे।
२६ कौ०