भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 541

प्र० ९८-९९ : अ० १ ] सन्ध्यादि छह गुण ४५७

कर्मोपघाती वा, व्यसनमस्य श्ववराहयोरिव कलहे वा स्वकर्मानुष्ठानपरो वा वर्धिष्ये' इत्यासनेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(१) यदि वा मन्येत—'यानसाध्यः कर्मोपघातः शत्रोः प्रतिविहित-स्वकर्मरक्षश्चास्मि' । इति यानेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(२) यदि वा मन्येत—'नास्मि शक्तः परकर्माण्युपहन्तुं स्वकर्मोपघातं वा त्रातुम्' इति बलवन्तमाश्रितः स्वकर्मानुष्ठानेन क्षयात्स्थानं स्थानाद्वृद्धिं चाकांक्षेत ।

(३) यदि वा मन्येत—'सन्धिनेकतः स्वकर्माणि प्रवर्तयिष्यामि, विग्रहे-णैकतः परकर्माण्युपहनिष्यामि' इति द्वैधीभावेन वृद्धिमातिष्ठेत् ।

(४) एवं षड्भिर्गुणैरेतैः स्थितः प्रकृतिमण्डले ।
पर्येषेत क्षयात् स्थानं स्थानाद् वृद्धिं च कर्मसु ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे षाड्गुण्यसमुद्देशक्षयस्थानवृद्धिनिश्चयो नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितोऽष्टनवनवतितमः ।

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तथा सूअरों के समान हमारा विग्रह हो जाने पर भी अपने कर्मों के अनुष्ठान में निरत रह कर मैं अपनी उन्नति कर सकूँगा, तो आसन का आश्रय लेकर वह अपनी उन्नति करे ।

(१) अथवा यदि समझें कि 'शत्रु के कर्मों का नाश यान से हो सकेगा और मैंने अपने कर्मों की रक्षा का पूरा प्रबंध कर दिया है' तो यान का आश्रय लेकर अपनी उन्नति करें ।

(२) अथवा यदि वह समझे कि मैं शत्रु के कर्मों को नाश कर सकूँगा और अपने कार्यों को उसके आक्रमणों से बचा न पाऊँगा' तो बलवान् का आश्रय लेकर अपने कार्यों का अनुष्ठान करता हुआ वह क्षय से स्थान और स्थान से वृद्धि की आकांक्षा करे ।

(३) और, अथवा ऐसा समझे कि 'मैं एक शत्रु के साथ सन्धि करके अपने कार्यों को पूर्ववत् करता रहूँगा और दूसरे के साथ विग्रह करके उसके कर्मों का नाश कर सकूँगा' तो द्वैधीभाव का आश्रय लेकर अपनी उन्नति का यत्न करे ।

(४) इस प्रकार अमात्य आदि प्रकृतिमण्डल में स्थित राजा को चाहिए कि वह सन्धि, विग्रह आदि छह गुणों का आश्रय लेकर क्षयावस्था को पार करके स्थान की और स्थानावस्था को पार करके वृद्धि की आकांक्षा करे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पहला अध्याय समाप्त ।

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