भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

प्र० १०० : अ० २ ] बलवान् का आश्रय ४५९

(१) अशक्ये दण्डोपनतवद् वर्तेत । (२) यदा चास्य प्राणहरं व्याधिमन्तःकोपं शत्रुवृद्धिं मित्रव्यसनमुपस्थितं वा तन्निमित्तामात्मनश्च वृद्धिं पश्येत्, तदा सम्भाव्यव्याधिधर्मकार्यापदेशेनापयायात् । स्वविषयस्थो वा नोपगच्छेत् । आसन्नो वास्य छिद्रेषु प्रहरेत् । (३) बलीयसोर्वा मध्यगतस्त्राणसमर्थमाश्रयेत् । यस्य वानन्तर्धिः स्यात् । उभौ वा । कपालसंश्रयस्तिष्ठेत् । मूलहरमितरस्येतरमपदिशन् भेदमुभयोर्वा परस्परादेशं प्रयुञ्जीत । भिन्नयोरुपांशुदण्डम् । (४) पार्श्वस्थो वा बलस्थयोरासन्नभयात् प्रतिकुर्वीत । दुर्गापाश्रयो वा द्वैधीभूतस्तिष्ठेत् । सन्धिविग्रहक्रमहेतुभिर्वा चेष्टेत । दूष्यामित्राटविकानुभयोरुपगृह्णीयात् । एतयोरन्यतरं गच्छंस्तैरेवान्यतरस्य व्यसने प्रहरेत् ।


( १ ) यदि बलवान् राजा के निकट गये बिना उसको प्रसन्न करना असम्भव जान पड़े तो अपनी सेना देकर उससे मिल-जुल कर नम्रतापूर्वक उसी के पास रहे ।

( २ ) और जब देखे कि वह बलवान् राजा किसी प्राणांतक व्याधि से ग्रस्त है, अथवा उसका पुरोहित आदि प्रकृतियाँ उससे असन्तुष्ट हैं, या उसके शत्रु बहुत बढ़ गये हैं, या अपने मित्र के ऊपर कोई बड़ी विपत्ति आई है; और इन्हीं कारणों से अपनी उन्नति का मार्ग देखे, तो किसी व्याधि या धर्मकार्य का बहाना कर वहाँ से अपने देश को कूच कर दे । यदि ये सभी व्याधियां-विपत्तियां स्वयं उसके देश में पैदा हो गई हों तो किसी व्याधि या धर्मकार्य के निमित्त बुलाये जाने पर भी वह अपने देश को न छोड़े । अथवा बलवान् राजा के पास रहकर ही वह उसके छिद्रों पर बराबर आघात करता रहे ।

( ३ ) अथवा दो बलवान् राजाओं के बीच में रहता हुआ वह अपनी रक्षा करने में समर्थ राजा के आश्रय में रहे । अथवा अपने समीपस्थ राजा का आश्रय ले । यदि दोनों ही समीप हों तो कपाल सन्धि के द्वारा दोनों का अनुग्रह प्राप्त करे । दोनों को वह एक-दूसरे का अपकार करने वाला बताता रहे । एक दूसरे के द्रव्य का नाश करने वाला बताकर उन दोनों में वह फूट डाल दे । इस प्रकार फूट डाल कर वह गुप्त उपायों द्वारा चुपचाप उन्हें मरवा दे ।

( ४ ) अथवा उन दोनों बलवान् राजाओं में जिसकी ओर से शीघ्र ही भय की आशंका देखे उसके पास रहता हुआ अपनी भावी आपत्ति का प्रतीकार करे । अथवा दुर्ग का आश्रय लेकर द्वैधीभाव द्वारा एक के साथ सन्धि कर दूसरे से विग्रह कर दे । अथवा सन्धि-विग्रह के निमित्तों को लेकर वह अपनी उन्नति का उपाय सोचे । अथवा उन दोनों ही प्रतिद्वन्द्वी राजाओं के दूष्य, शत्रु और आटविक आदि को उच्च दान-