भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पत्नी के विभिन्न रक्तों ( गोत्रों ) का संमिश्रण होकर अच्छी संतति को पैदा किया जा सके। इस व्यवस्था ने समाज में विभिन्न परिवारों को संघटित करने में बड़ी सहायता की। विवाह के लिए सम-स्वभाव के दम्पती को ही आवश्यक बताया गया है। सम-स्वभाव अर्थात् ऐसे परिवार जो व्यवसाय, आर्थिकस्तर, धर्म और विचारों में एकता रखते हों। एकता की इसी भावना ने पहिले तो विच्छिन्न व्यक्ति-समूहों को कुछ विशिष्ट जातियों में एकत्र किया और बाद में भी उन्हीं संघटित जातियों के द्वारा वृहद् राष्ट्र की नींव पड़ी।

न्याय और व्यवस्था

प्राचीन भारत की राज्य-व्यवस्था में धर्म का सर्वोच्च स्थान रहा है। समाज के सभी वर्ग और सारी कार्य-प्रणाली के मूल में धर्म के नीति-निर्देश समन्वित थे। समाज का सबसे बड़ा व्यवस्थापक राजा भी धर्म के बन्धन से इस प्रकार बंधा था कि इस दिशा में कोई संस्कार-संशोधन करने का उसे कोई अधिकार ही नहीं था। धर्मसूत्रों और मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में राजा को धर्म का ही एक अंग माना गया है। हिन्दू राज्य-व्यवस्था में जिस युग में राजा को सभी अधिकार प्राप्त थे तब भी राजा से धर्म को उच्च स्थान प्राप्त था। मनुस्मृति में तो राजा को अर्थदण्ड देने तक की बात कही गई है ( ८।३३६ )। अर्थशास्त्र में तो राजा को इतनी छूट दी गई है कि वह कानून बना सकता है; किन्तु धर्मशास्त्र में वह बात भी नहीं है। अर्थशास्त्र (अर्थशास्त्र, पृ० २५९) में साथ ही यह भी कहा गया है कि राजा ऐसा कानून नहीं बना सकता है जो धर्म के विरुद्ध हो और जिससे राजा को मनमाना अधिकार प्राप्त हो सके।

प्राचीन भारत में, जब कि हिन्दू-शासन-प्रणाली सर्वथा एक राजत्व पर आधारित थी, न्याय-विभाग, शासन-विभाग से अलग रखा जाता था। उस समय राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान् तथा श्रेष्ठ नैतिक आचरण वाले पुरोहित, राजनीतिज्ञ और ब्राह्मण लोग मंत्री नियुक्त किये जाते थे और वही न्यायाधीश भी हुआ करते थे। धर्म-संबंधी सारी शासन-व्यवस्था पुरोहितों के हाथ में थी। उस पुरोहित न्यायाधीश पर राजा का कोई अंकुश नहीं होता था।

इस प्रकार की कानूनी अदालत का नाम सभा था, जिसमें न्यायाधीशों की सहायता के लिए समाज के लोगों की एक स्वतन्त्र संस्था भी हुआ करती थी। मनु के मतानुसार तीन पंच, न्यायाधीशों की सहायता के लिए हुआ करते थे (मनुस्मृति ८।१०) और जो कानून पारित किया जाता था, उसका ठीक