भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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४७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) तासां हिरण्यधान्यक्षयः सर्वोपघाती कृच्छ्रप्रतीकारश्च। युग्य-पुरुषक्षयो हिरण्यधान्यसाध्यः।

(२) लोभ ऐकदेशिको मुख्यायत्तः परार्थेषु शक्यः प्रतिहन्तुमादातुं वा।

(३) विरागः प्रधानावरग्रहसाध्यः। निष्प्रधाना हि प्रकृतयो भोग्या भवन्त्यनुपजाप्याश्चान्येषामनापत्सहास्तु। प्रकृतिमुख्यप्रग्रहैस्तु बहुधा भिन्ना गुप्ता भवन्त्यापत्सहाश्च।

(४) सामवायिकानामपि सन्धिनिग्रहकारणान्यवेक्ष्य शक्तिशौचयुक्तेन सम्भूय यायात्। शक्तिमान् हि पार्ष्णिग्रहणे यात्रासाहाय्यदाने वा शक्तः, शुचिः सिद्धौ चासिद्धौ च यथास्थितकारीति।

(५) तेषां ज्यायसैकेन द्वाभ्यां समाभ्यां वा सम्भूय यातव्यमिति। द्वाभ्यां समाभ्यां श्रेयः। ज्यायसा ह्यवगृहीतश्चरति समाभ्यामतिसन्धाना-


( १ ) इन प्रकृतियों के हिरण्य और धान्य का क्षय हो जाना सर्वस्व नष्ट कर देने वाला होता है। इसलिए इसका प्रतीकार करना भी अत्यन्त कठिन हो जाता है। किन्तु हाथी-घोड़ों और पुरुषों के क्षय का प्रतीकार हिरण्य तथा धान्य आदि के द्वारा सुगमता से हो सकता है।

( २ ) अमात्य आदि प्रकृतिजनों में किसी एक मुखिया को ही लोभ होता है। शत्रु या यातव्य की सम्पति द्वारा उसका प्रतीकार किया जा सकता है, अथवा मुख्य व्यक्तियों के द्वारा वह वापिस भी लिया जा सकता है।

( ३ ) परन्तु विराग का प्रतीकार केवल मुख्य पुरुष को वश में करने से ही नहीं हो सकता है। मुखिया रहित प्रकृतिजन शत्रु के वश में हो जाते हैं। वे दूसरे के वश में भी जा सकते हैं, किन्तु वे आपत्तियों को सहन नहीं कर सकते हैं, आपत्ति के समय वे विजिगीषु को छोड़कर चले जाते हैं, मुखिया के आधीन रहने पर वे शत्रु से नहीं फोड़े जा सकते हैं और आक्रमण के समय भी वे विपत्ति को सहन कर लेते हैं।

( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह सन्धि-विग्रह के कारणों को भलीभाँति सोच-समझ कर अपने सहयोगी राजाओं की शक्ति एवं पवित्रता को परख कर उनके साथ ही शत्रु पर चढ़ाई कर दे। क्योंकि बलवान् राजा पार्ष्णिग्राह राजा के रोकने में सहायता करता है। और विश्वासपात्र राजा युद्ध में सेना आदि देकर उसके कार्यों में सहायता करता है, और निष्कपट राजा कार्यसिद्धि होने या न होने पर न्यायमार्ग का अनुसरण करता है।

( ५ ) उनमें भी अधिक शक्तिशाली एक राजा के साथ गठबंधन करके चढ़ाई करनी चाहिए या समान शक्ति वाले दो राजाओं के साथ सुलह करके आक्रमण करना चाहिए ? ऐसी दशा में समान शक्ति राजा को साथ लेकर युद्ध करना ही श्रेयस्कर