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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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बलात्कार, व्यभिचार जैसे सामाजिक तथा नैतिक पतन के कार्यों के लिए कौटिल्य ने कठोर दण्ड निर्धारित किये हैं। चरित्र सम्बन्धी ऊँचाई के लिए कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था बड़ी ही उपयोगी है।

राज्य की आर्थिक आय के साधन

कौटिल्य की साम्राज्य-व्यवस्था का आर्थिक ढाँचा औद्योगिक आधार-भूमि पर खड़ा है। कौटिल्य की अर्थ-नीति के प्रमुख सिद्धान्त तीन हैं। पहिले सिद्धांत के अन्तर्गत ऐसे उद्योगों ( Industries ) को रखा गया है, जिन पर राज्य का स्वामित्व हो और जो राज्य के द्वारा ही संचालित एवं संघटित हों। इन उद्योगों की पूंजी ( Capital ), श्रम ( Labour ) और प्रबन्ध ( Management ) का दायित्व राज्य पर ही निर्भर रहे। इस प्रकार की औद्योगिक अर्थनीति का परोक्ष उद्देश्य एक सशक्त, आत्म-निर्भर और सर्वसाधनसंपन्न राज्य की प्रतिष्ठा करना था। इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण उद्योगों ( Key Industries ) में सोना, चाँदी, शिलाजीत, ताँबा, शीशा, टिन, लोहा, मणि, लवण आदि आकर उद्योगों ( Industry of mines ) का प्रमुख स्थान है।

दूसरे प्रकार के उद्योगों का सम्बन्ध जनता से है। इस श्रेणी के उद्योग राज्य के नागरिकों की निजी सम्पत्ति ( Private Property ) के रूप में माने गये हैं। उनके संघटन, संचालन और पूंजी, श्रम एवं प्रबन्ध का दायित्व भी नागरिकों पर ही निर्भर है। उन पर जनता का ही पूर्ण स्वामित्व है। ऐसे उद्योगों में खेती, सूत, शिल्प, गो-पालन, अश्व-पालन, हस्ति-पालन, सुरा, मांस, वेश्यालय और नट-नर्तक गायक-वादक आदि की गणना की जा सकती है।

कौटिल्य की अर्थनीति का तीसरा सिद्धांत समाज में ऐसी सुव्यवस्था बनाये रखने से संबद्ध है, जिसके अनुसार राज्य के समस्त उत्पादन ( Production ), वितरण ( Distribution ) और उपभोग ( Consumption ) पर शासन-सत्ता का नियन्त्रण बना रहेगा।

उक्त सभी उद्योगों तथा व्यवसायों पर राज्य का स्वामित्व ( State Ownership ) इसलिए माना गया है कि राज्य का अर्थबल सशक्त बना रहे और समाज के सभी वर्ग क्रियाशील बने रहें।

धर्म-दर्शन, काव्य, कला और अर्थ आदि साहित्य के जितने भी अंग हैं, उनमें धर्म-अर्थ-काम एवं मोक्ष, इस वर्गचतुष्टय की उपयोगिता पर अनेक प्रकार से विचार किया गया है। अर्थशास्त्र, क्योंकि ऐहिक जीवन से संबद्ध क्रिया व्यापारों की ही विवेचना प्रस्तुत करता है, अतः उसमें मोक्ष को छोड़कर

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