कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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५०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) एवंविधेभ्यः पृथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रवित् । संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे भूमिसन्धिर्नाम दशमोऽध्यायः, आदितः सप्तशततमः ।
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युद्ध नहीं करने पाते हैं । इसलिए उनको सरलता से वश में किया जा सकता है । परन्तु आकाशयोधी शत्रु केवल शस्त्र द्वारा ही युद्ध करता है । इसलिए उसको जीतना कठिन है ।
( १ ) इस प्रकार अर्थशास्त्रज्ञ विजिगीषु राजा, ऊपर बताये गए संहित एवं दूसरे राजाओं से, पृथ्वी को प्राप्त करता हुआ अपनी उन्नति करता जाय ।
इति षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में भूमिसन्धि नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
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