भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 590

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) खनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः, धान्यभोगः कोशकोष्ठा-गारकरः धान्यमूला हि दुर्गादीनां कर्मणामारम्भाः । महाविषयविक्रयो वा खनिभोगः श्रेयान् ।

(२) 'द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभूतनिधान-क्षमश्च । विपरीतो हस्तिवनभोगः' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । शक्यं द्रव्यवनमनेकमनेकस्यां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनं, हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ।

(४) वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगः, नित्यः स्थलपथभोग इति ।

(५) भिन्नमनुष्या श्रेणीमनुष्या वा भूमिरिति । भिन्नमनुष्या श्रेयसी ।


भूमि को अधिक उपजाऊ बनाना अपने हाथ में निर्भर है; इसलिए अधिक भूमि को लेना ही श्रेष्ठ है ।

( १ ) खानयुक्त तथा धान्ययुक्त भूमियों में खानयुक्त भूमि केवल कोष की वृद्धि करती है; किन्तु धान्ययुक्त भूमि कोष और कोष्ठागार दोनों को संपन्न करती है । क्योंकि दुर्ग आदि कर्मों की उन्नति भी धान्यमूलक ही है; अतः धान्ययुक्त भूमि ही श्रेयस्कर होती है । अथवा खानयुक्त भूमि भी उत्तम है, क्योंकि वहाँ से उत्पन्न वस्तुओं का बड़ा भारी व्यापार किया जा सकता है ।

( २ ) 'लकड़ी के जंगल और हाथी के जंगल, दोनों में से कौन श्रेष्ठ है ?' इस संबंध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि लकड़ियों का जंगल ही श्रेष्ठ है; क्योंकि एक तो दुर्ग आदि कर्मों में लकड़ी की बड़ी आवश्यकता होती है और दूसरे उसका अधिक-से अधिक संचय सरलता से किया जा सकता है । किन्तु हाथी के जंगलों में यह उपयो-गिता नहीं होती है ।

( ३ ) आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है । उसका कथन है कि 'लकड़ी के जंगल अपनी इच्छानुसार बनाये जा सकते हैं; हाथियों के जंगल स्वयं नहीं बनाये जा सकते हैं । शत्रु की सेना को नाश करने वाले साधनों में हाथी प्रमुख साधन है । इसलिए हाथियों के जंगल ही श्रेष्ठ हैं ।'

( ४ ) जलमार्ग और स्थलमार्ग में दोनों ही अनित्य ( अस्थायी ) हों तो उनमें जलमार्ग ही उत्तम है । यदि दोनों ही नित्य ( स्थायी ) हों तो स्थलमार्ग ही उत्तम समझना चाहिए ।

( ५ ) 'भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि अच्छी है या समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि श्रेष्ठ है ?' इन दोनों में भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ समझनी