भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

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प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१५

(१) अल्पागमातिव्ययता क्षयो वृद्धिविपर्यये ।
समायव्ययता स्थानं कर्मसु ज्ञेयमात्मनः ॥
(२) तस्मादल्पव्ययारम्भं दुर्गादिषु महोदयम् ।
कर्म लब्ध्वा विशिष्टाः स्यादित्युक्ताः कर्मसन्धयः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे कर्मसन्धिर्नाम द्वादशोऽध्यायः आदितो नवोत्तरशततमः ।

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( १ ) थोड़ी आय तथा अधिक खर्च हो तो क्षय, इसके विपरीत वृद्धि समझनी चाहिए । इसी प्रकार बराबर आय व्यय में समान अवस्था समझनी चाहिए ।

( २ ) इसलिये विजिगीषु को चाहिए कि वह दुर्ग आदि के कार्यों में थोड़ा खर्च करके ही महान् फल प्राप्त करने की चेष्टा करे । महान् फल देने वाले कार्य को प्राप्त करके ही विजिगीषु अपने शत्रु से बढ़ सकता है । यही कर्मसन्धि है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिककरण में कर्मसन्धि नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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