कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १२१ |
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| अध्याय १६ |
दण्डोपनायिवृत्तम्
(१) अनुज्ञातस्तद्धिरण्योद्वेगकरं बलवान् विजिगीषमाणो, यतः स्वभूमिः स्वर्तुवृत्तिश्च स्वसैन्यानामदुर्गापसारः शत्रुरपार्ष्णिर्नासारश्च, ततो यायात् । विपर्यये कृतप्रतीकारो यायात् । (२) सामदानाभ्यां दुर्बलानुपनमयेद्, भेददण्डाभ्यां बलवतः । (३) नियोगविकल्पसमुच्चयैश्चोपायानामनन्तरैकान्तराः प्रकृतीः साधयेत् । (४) ग्रामारण्योपजीविब्रजवणिक्पथानुपालनमुज्झितापसृतापकारिणां चार्पणमिति सान्त्वमाचरेत् । भूमिद्रव्यकन्यादानमभयस्य चेति दानमाचरेत् ।
अधीनस्थ राजाओं के प्रति विजेता विजिगीषु का व्यवहार
(१) यदि पराजित राजा द्वारा प्रतिज्ञात हिरण्यसंधि का उल्लंघन विजेता राजा को उद्विग्न करे तो बलवान् विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के उस प्रदेश पर चढ़ाई कर दे, जहाँ के रास्ते उसके अपने अधिकार में हों; अपनी सेना के लिए अनुकूल समय एवं उसके खाने-पीने की पूरी सुविधा हो, जहाँ न तो शत्रु के दुर्ग हों तथा निकल भागने के लिए भी मार्ग न हो, जहाँ पर शत्रु राजा विजिगीषु से पाष्णिग्राह को न भिड़ा दे, और जहाँ उसके मित्रबल का अभाव हो । यदि ऐसी कोई भी सुविधा न हो तो इन सबका प्रतीकार करके ही वह आक्रमण करे ।
(२) दुर्बल राजाओं को शांति या धन देकर अपने वश में करना चाहिए और और बलवान् राजा को भेद तथा दण्ड के द्वारा ।
(३) नियोग, विकल्प और समुच्चय आदि उपायों से शत्रु-प्रकृति और मित्र-प्रकृति को वश में करना चाहिए ।
(४) गाँव या जंगल में रहने वाली गाय, भैंसों की एवं जल, स्थल के व्यापारी मार्गों की रक्षा करना, दूसरे राजा के भय से या स्वयं अपकार करके भागे हुए दूष्य, अमात्य आदि प्रकृतियों को खोज-खोज कर के देना, आदि उपकार कार्यों से शत्रु राजा के साथ सामरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार भूमिदान, द्रव्यदान, कन्यादान, अभयदान आदि उपकारों से दुर्बल राजा के साथ दानरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए।