कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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विश्वासों की जो मिथ्याएँ थीं, उनकी जगह सच्चाई, प्रकाश, न्याय और समानता ने ले ली थी। समाजवाद के अभ्युदय का यह अठारहवीं शताब्दी का स्वरूप था। इस नयी क्रांति के बाद पहिले तो उस समय के सामन्ती ठाकुरों तथा पूँजीवादियों के बीच संघर्ष हुआ और इसी बीच शोषकों तथा शोषितों का संघर्ष भी जारी था। यह संघर्ष था पूँजीवादी वर्ग का और मजदूर वर्ग का ( फ्रेडरिक एंगेल्स, समाजवाद : वैज्ञानिक और काल्पनिक, पृ० ६ ) ।
१८वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाजवादी क्रांति के पोषक हुए मोरेली, मैब्लीकी, सेंट साइमन, फूरिये और ओवेना। इनमें सेंट साइमन का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। फ्रांसीसी क्रांति के समय यद्यपि उसकी अवस्था तीस साल से भी कम थी, फिर भी उसका दृष्टिकोण इतना व्यापक और व्यक्तित्व इतना प्रतिभाशाली था कि उसके बाद जितने भी अर्थशास्त्री हुए हैं, उनके विचारों में जितनी बातें देखने को मिलती हैं उन सबका मूल साइमन की रचनाओं में है।
फूरिये ने सामाजिक विकास के पूरे इतिहास को जांगल, वर्वर, पितृसत्ता-त्मक और सभ्य—इन चार भागों में विभक्त किया है। अपने समसामयिक दार्शनिक होगेल की ही भाँति फूरिये ने भी द्वन्द्ववाद की प्रणाली का आश्रय लेकर यह दर्शाया है कि अंत में जाकर मनुष्य जाति का भी नाश हो जायेगा। उसने पूँजीवादी प्रवृत्तियों के समर्थक लेखकों की बड़ी खिल्ली उड़ाई है। वह एक सिद्धहस्त व्यंग्यकार भी था और उसने तत्कालीन समाज में व्याप्त धोखे-बाजी तथा व्यावसायिक मनोवृत्ति का बड़ा ही सजीव रूप उतारा है ( वही, पृ० १६ ) । फूरिये के विचारों के अनुसार समाज की उक्त बुराइयों को सुधारने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया, राबर्ट ओवेन ने। उसने समाज की पूर्ण साम्यवादी ढंग से संघटन की दिशा में भी यत्न किया ( वही, पृ० २० ) ।
अब तक समाजवाद का उद्देश्य था एक दोषरहित समाज-व्यवस्था का निर्माण करना किन्तु अब उसका उद्देश्य हो गया है पूँजीपति और मजदूर वर्गों के और उनके पारस्परिक संघर्षों के आर्थिक घटनाक्रमों के इतिहास का अध्ययन करना। इस समीक्षित सिद्धांत के द्वारा यह पता लग सका है कि अतीत का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है और वर्गों के उदय के मूल में एक मात्र कारण रही हैं, आर्थिक परिस्थितियां ( वही, पृ० २७-२८ ) ।
अब तक दार्शनिकों ने इतिहास को अतिभौतिकवादी, द्वंद्ववादी, आदर्श-