कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण |
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( १ ) कर्शनीयोच्छेदनीययोश्चेन्मित्राणि मध्यमस्य साचिव्यकराणि स्युः, पुरुषान्तरेण सन्धियेत । विजिगीषोर्वा तयोर्मित्राण्यवग्रहसमर्थानि स्युः, सन्धिमुपेयात् ।
( २ ) अमित्रं वास्य मध्यमो लिप्सैत, सन्धिमुपेयात् । एवं स्वार्थश्च कृतो भवति, मध्यमस्य प्रियं च ।
( ३ ) मध्यमश्चेत्स्वमित्रं मित्रभावि लिप्सैत, पुरुषान्तरेण सन्दध्यात् । सापेक्षं वा 'नार्हसि मित्रमुच्छेत्तुम्' इति वारयेत् । उपेक्षेत वा—मण्डलमस्य कुप्यतु स्वपक्षवधादिति ।
( ४ ) अमित्रमात्मनो वा मध्यमो लिप्सैत, कोशदण्डाभ्यामेनमहश्यमानोऽनुगृह्णीयात् ।
( १ ) यदि कर्शनीय और उच्छेदनीय राजाओं के दूसरे मित्र भी मध्यम की ही सहायता करते हों तो विजिगीषु को चाहिए कि वह भी अपने अमात्य या राजकुमार को विश्वास के लिए बन्धक में रखकर मध्यम से सन्धि कर ले । यदि विजिगीषु, के कर्शनीय और उच्छेदनीय राजाओं के मित्र मध्यम का मुकाबला करने के लिए तैयार हों तो वह भी मध्यम के साथ सन्धि कर ले ।
( यहाँ तक अपने मित्रों पर अभियोग करने वाले मध्यम के साथ विजिगीषु का क्या व्यवहार होना चाहिए, इसका निरूपण किया गया । विजिगीषु के शत्रुओं पर अभियोग करने वाले मध्यम के साथ विजिगीषु का क्या व्यवहार होना चाहिए, अब इसका निरूपण किया जाता है । )
( २ ) यदि विजिगीषु के किसी शत्रु राजा को मध्यम अपने वश में करना चाहता है तो विजिगीषु को चाहिए कि वह मध्यम के साथ सन्धि कर ले; क्योंकि ऐसा करने से एक तो अपने शत्रु का नाश हो जाने से अपनी कार्यसिद्धि हो जाती है और दूसरे में वह मध्यम का भी प्रिय हो जाता है ।
( ३ ) यदि मध्यम अपने ही किसी मित्रभावी मित्र को वश में करना चाहे तो उस समय विजिगीषु अपने सेनापति आदि को भेज कर मध्यम की सहायता करे । यदि उससे अपनी कार्यसिद्धि होती देखे तो मध्यम को आक्रमण करने से रोके । ऐसा करने से विजिगीषु दूसरे राजाओं का भी विश्वासपात्र हो जाता है । अथवा यह सोच-कर उधर से आँखें फेर ले कि अपने मित्र पर आक्रमण करने वाले मध्यम से सारा राजमण्डल ही कुपित हो जायेगा ।
( ४ ) यदि मध्यम किसी शत्रुराजा को ही अपने अधीन करना चाहे तो विजिगीषु को चाहिये कि कोश तथा सेना द्वारा छिपे तौर पर ही शत्रु की सहायता करे ।