भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण १२७
अध्याय १

प्रकृतिव्यसनवर्गः


(१) व्यसनयौगपद्ये सौकर्यतो यातव्यं रक्षितव्यं वेति व्यसनचिन्ता । (२) दैवं मानुषं वा प्रकृतिव्यसनमनयापनयाभ्यां सम्भवति । (३) गुणप्रातिलोम्यमभावः प्रदोषः प्रसङ्गः पीडा वा व्यसनम् । व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम् । (४) स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्रव्यसनानां पूर्वं पूर्वं गरीय इत्याचार्याः । (५) नेति भारद्वाजः । स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीय इति । मन्त्रो मन्त्रफलावाप्तिः कार्यानुष्ठानमायव्ययकर्म दण्डप्रणयनममित्राटवी-


प्रकृतियों के व्यसन और उनका प्रतीकार

( १ ) जब शत्रु और विजिगीषु, दोनों पर एक जैसी विपत्ति आ पड़ी हो और शत्रु पर आक्रमण करने तथा अपनी रक्षा करने, दोनों में समानता दीखती हो, ऐसी दशा में चढ़ाई करनी चाहिए या आत्मरक्षा करनी चाहिए ? यह विचार सामने आता है । इस हेतु इस अध्याय में पहिले व्यसनों का चिंतन किया जाता है ।

( २ ) व्यसन दो प्रकार का है : एक दैव और दूसरा मानुष । अमात्य आदि प्रकृति वर्ग के ये दोनों व्यसन अनय और अपनय के कारण पैदा होते हैं । सन्धि आदि की उचित व्यवस्था न करना अनय और शत्रुओं से पीड़ित होते रहना अपनय कहलाता है ।

( ३ ) गुणों की प्रतिकूलता या अभाव, उनका अनुचित उपयोग, प्रकृतिवर्ग में दोषों की अधिकता, विषयों में अति आसक्ति और शत्रुओं द्वारा पीड़ित होना, ये पाँच प्रकार के व्यसन हैं । 'व्यसन' का शब्दार्थ ही यह है जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे । अर्थात् जो कार्य राजा को नीचे गिरा दे वही उसके लिए व्यसन है ।

( ४ ) कुछ आचार्यों का मत है कि 'स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र, इनमें पूर्व-पूर्वं की विपत्ति अत्यन्त कष्टकर है ।'

( ५ ) परन्तु आचार्य भारद्वाज का कहना है कि 'यदि स्वामी और अमात्य पर एक साथ व्यसन आ पड़े तो अमात्य का व्यसन ही अधिक भयावह है; क्योंकि प्रत्येक कार्य का विचार, उसके फलाफल की प्राप्ति का चिंतन, आवश्यक कार्यों को करना,