भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १३०-१३२ : अ० ४ ] पीडनवर्ग, स्तंभवर्ग, कोषसंगवर्ग ५७७

(१) नेति कौटिल्यः । सुव्यावर्त्या श्रेणी समानशीलव्यसनत्वात्, श्रेणीमुख्यैकदेशोपग्रहेण वा । स्तम्भयुक्तो मुख्यः परप्राणद्रव्योपघाताभ्यां पीडयतीति । (२) सन्निधातृसमाहर्त्रोः सन्निधाता कृतविदूषणात्ययाभ्यां पीडयति । समाहर्ता करणाधिष्ठितः प्रदिष्टफलोपभोगी भवतीत्याचार्याः । (३) नेति कौटिल्यः । सन्निधाता कृतावस्थमन्यैः कोशप्रवेश्यं प्रतिगृह्णाति । समाहर्ता तु पूर्वमर्थमात्मनः कृत्वा पश्चाद् राजार्थं करोति प्रणाशयति वा, परस्वादाने च स्वप्रत्ययश्चरतीति । (४) अन्तपालवैदेहकयोरन्तपालश्चोरप्रसंगदेयात्यादानाभ्यां वणिक्पथं पीडयति । वैदेहकास्तु पण्यप्रतिपण्यानुग्रहैः प्रसाधयन्ति । इत्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । अन्तपालः पण्यसम्पातानुग्रहेण वर्तयति । वैदेह-


(१) परन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'श्रेणी पुरुषों को चोरी, डाका आदि से सहज ही में रोका जा सकता है; क्योंकि जहाँ वे चोरी-डाका करते हैं वे लोग भी उन्हीं के स्वभाव एवं व्यवसाय के होते हैं। उनके मुखिया को वश में करके भी उनको चोरी आदि से रोका जा सकता है। परन्तु राजकीय मुख्य पुरुष बड़े अभिमानी होते हैं और वे प्राण तथा धन का अपहरण करके दूसरों को बहुत कष्ट पहुँचाते हैं।'

(२) प्राचीन आचार्य, सन्निधाता और समाहर्त्ता, दोनों में से सन्निधाता को अधिक कष्टकर समझते हैं; क्योंकि वह कार्य बिगाड़कर और प्रजा से अनुचित कर वसूल कर प्रजा को तंग करता है। परन्तु समाहर्त्ता अपने ठीक हिसाब से कार्य करता हुआ नियमित नौकरी को भोगने वाला होता है।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना कुछ और ही है। उनका कथन है कि 'सन्निधाता तो दूसरे कर्मचारियों द्वारा वसूल किए हुए धन को एकत्र कर कोष में जमा कर देता है। किन्तु समाहर्त्ता पहिले अपनी रिश्वत लेकर फिर राजकर को वसूल करता है। अथवा उसमें से भी कुछ चुरा लेता है और स्वेच्छया सब कुछ करता है।'

(४) प्राचीन आचार्यों के मत से 'अन्तपाल और वैदेहक, इन दोनों में से अन्तपाल ही अधिक कष्टप्रद है; क्योंकि वह चोरों द्वारा राहगीरों को लुटवाता है; रास्ते का टैक्स मनमाना वसूल करता है; और व्यापारिक मार्गों पर चलने वाले पथिकों को अधिक कष्ट पहुँचाता है। परन्तु वैदेहक क्रय-विक्रय पर अधिक लाभ पहुंचा कर देश को व्यापारिक भागों को उन्नत बनाता है।'

(५) इसके विरुद्ध आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'अन्तपाल एक साथ लाये

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