भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १४२ : अ० ४ ] क्षय-व्यय-लाभ विचार ६११

(१) गमनमात्रसाध्यत्वाद्ध्रस्वकालः ।
(२) मन्त्रसाध्यत्वात्तनुकशयः ।
(३) भक्तमात्रव्ययत्वादल्पव्ययः ।
(४) तदात्ववैपुल्यान्महान् ।
(५) अर्थानुबन्धकत्वाद् वृद्ध्युदयः ।
(६) निराबाधकत्वात्कल्यः ।
(७) प्रशस्तोपादानाद्धर्म्यः ।
(८) सामवायिकानामनिबन्धगामित्वात्पुरोग इति ।
(९) तुल्ये लाभे, देशकालौ शक्त्युपायौ प्रियाप्रियौ जवाजवौ सामीप्य-विप्रकर्षौ तदात्वानुबन्धौ सारत्वसातत्ये बाहुल्यबाहुगुण्ये च विमृश्य बहुगुणयुक्तं लाभमाददीत ।


लाता है । राजद्रोही मंत्रियों के अनादर से जो लाभ प्राप्त हो वह भी प्रकोपक है, क्योंकि मंत्रियों के मन में यह शंका हो जाती है कि सिद्धिलाभ करके अवश्य ही राजा उनको नष्ट कर देगा । प्रकोपक लाभ से विपरीत गुणसंपन्न लाभ प्रसादक है । यहाँ तक प्रसादक और प्रकोपक के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( १ ) अल्पश्रम और अल्पकालीन लाभ से प्राप्त लाभ ह्रस्वकाल कहा जाता है ।

( २ ) जो लाभ केवल उपजाप आदि से ही प्राप्त हो उसे तनुकशय कहते हैं ।

( ३ ) जो लाभ केवल भोजन-भत्ता व्यय करके ही प्राप्त हो उसे अल्पव्यय कहते हैं ।

( ४ ) जो लाभ अत्यधिक मात्रा में तत्काल ही प्राप्त हो उसे महान् कहते हैं ।

( ५ ) जो लाभ भविष्य में भी अत्यधिक अर्थ-प्राप्ति कराने वाला हो उसे वृद्ध्युदय कहते हैं ।

( ६ ) जिस लाभ में आगे किसी तरह की बाधा उपस्थित न हो उसे कल्य कहते हैं ।

( ७ ) जो लाभ प्रकाशयुद्ध आदि उपादानों से धर्मपूर्वक प्राप्त किया गया हो उसे धर्म्य कहते हैं ।

( ८ ) जो लाभ मित्रराजाओं ने निर्बाध रूप से बिना किसी शर्त के प्राप्त किया हो उसे पुरोग कहते हैं ।

( ९ ) यदि दोनों पक्षों में बराबर लाभ दिखाई दे तो ऐसा बहुगुणविशिष्ट लाभ प्राप्त करना चाहिए जिसमें देश, काल, शक्ति, उपाय, प्रियाप्रिय, जयाजय, समीप-दूर, तात्कालिक, भविष्य में लगातार होना, बहुमूल्य, उपयोगी, अधिक और अत्युत्तम आदि गुण विद्यमान हों ।