कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 721, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १४७ | ## स्कन्धावारनिवेशः |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) वास्तुकप्रशस्ते वास्तुनि नायकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्कन्धावारं वृत्तं दीर्घं चतुरस्रं वा, भूमिवशेन वा, चतुर्द्वारं षट्पथं नवसंस्थानमापयेयुः । खातवप्रसालद्वारारट्टलकसम्पन्नं भये स्थाने च ।
(२) मध्यमस्योत्तरे नवभागे राजवास्तुकं धनुःशतायाममर्धविस्तारं पश्चिमार्धे तस्यान्तःपुरम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं चान्ते निविशेत । पुरस्तादुपस्थानं, दक्षिणतः कोशशासनकार्यकरणानि, वामतो राजौपवाह्यानां हस्त्यश्वरथानां स्थानम् । अतो धनुःशतान्तराश्चत्वारः शकटमेथीप्रततिस्तम्भ-
छावनी का निर्माण
(१) भवन-निर्माण-कला के विशेषज्ञों द्वारा प्रशंसित क्षेत्र में सेनापति (नायक), कारीगर (वर्धकि) और ज्योतिषी (मौहूर्तिक) ये तीनों पारस्परिक परामर्श से गोलाकार, लंबा, चौकोर या जैसी भूमि हो उसी के अनुसार चारों दिशाओं में चार दरवाजों, छह मार्गों और नौ संस्थानों (डिविजन्स = वर्गों) से युक्त सैनिक छावनी (स्कंधावार) का निर्माण करायें। खाई, सफील, परकोटा, एक प्रधान द्वार और अट्टालिकाओं से युक्त स्कंधावार उसी अवस्था में बनवाया जाय, जबकि आक्रमण का भय तथा अधिक समय तक वहाँ टिके रहने की संभावना हो।
(२) स्कंधावार के बीच में उत्तर की ओर नौवें हिस्से में सौ धनुष लंबा तथा पचास धनुष चौड़ा और राजा का निवास-स्थान बनवाया जाय। उसके आधे हिस्से में पश्चिम की ओर अंतःपुर का निर्माण कराया जाय और अन्तःपुर के समीप ही अन्तःपुररक्षकों के लिए भी स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के सामने राजा का विश्रामस्थान (उपस्थान) होना चाहिए। राजगृह की दाहिनी ओर खजाना, सेक्रेट्रिएट (शासनकरण) और कार्य-निरीक्षकों (कार्यकरण) के स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के बाँई ओर हाथी, घोड़ा, रथ आदि वाहनों के लिए स्थान होना चाहिए। राजगृह के कुछ दूर चारों ओर रक्षार्थ चार बाड़ बनवाये जायें, जिनमें पहली बाड़ गाड़ियों की, दूसरी बाड़ कांटेदार लताओं की, तीसरी बाड़ मजबूत