भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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६५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पुनरावर्तमानस्य निराशस्य च जीविते । अधार्यो जायते वेगस्तस्माद्भग्नं न पीडयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे कूटयुद्धविकल्पाः स्वसैन्योत्साहनं स्वबलान्य-बलव्यायोगश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रिंशदुत्तरशततमः ।

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नष्ट-भ्रष्ट कर फिर स्वयं ही उससे संधि के लिए प्रार्थना करे । यदि शत्रु समान शक्ति का हो तो उसकी प्रार्थना करने पर ही विजिगीषु संधि के लिए तैयार हो । अपने से हीन शक्ति राजा को तो ऐसा तहस-नहस कर देना चाहिए कि फिर कभी भी वह उठ न सके । किन्तु यदि हीनशक्ति राजा-अनुकूल स्थान पर हो या जीवन से निराश हो चुका हो तो उसको न मारा जाय ।

( १ ) जीवन से निराश हुआ शत्रु यदि युद्धक्षेत्र से बचकर वापिस आता है तो उसका युद्धावेश ठंडा पड़ जाता है । इसलिए पहिले ही से निराश एवं कमजोर शत्रु को पीड़ा पहुँचा कर कुपित नहीं करना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में कूटयुद्ध-सैन्यव्यायोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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