कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १५३-१५४ : अ० ४ ] युद्धभूमि और सैन्यकर्म ६५३
पूर्वप्रहारो व्यावेशनं, व्यावेधनमाश्वासो, ग्रहणं, मोक्षणं, मार्गानुसारविनिमयः, कोशकुमाराभिहरणं, जघनकोटचभिघातो, हीनानुसारणमनुयानं, समाजकर्मेत्यश्वकर्माणि ।
(१) पुरोयानमकृतमार्गवासतीर्थकर्म बाहूत्सारस्तोयतरणावतरणे स्थानगमनावतरणं विषम सम्बाधप्रवेशोऽग्निदानशमनमेकाङ्गविजयः, भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं व्यसने त्राणमभिघातो विभीषिका त्रासनमौदार्यं ग्रहणं मोक्षणं सालद्वाराट्टालकभञ्जनं कोशवाहनापवाहनमिति हस्तिकर्माणि ।
( जहाँ सूर्य का पूर्ण प्रकाश हो ), आदि सुविधाजनक स्थानों को पहिले ही से अपने कब्जे में कर लेना चाहिए, शत्रुदेश से आने वाले जीविकोपार्जन योग्य पदार्थों तथा शत्रु के मित्र की सेना का नाश और अपने पदार्थों एवं सेना की रक्षा, छिपकर प्रविष्ट हुई शत्रुसेना की सफाई और अपनी सेना की दृढ़ स्थिति, धान्य तथा घास आदि का संग्रह, शत्रु सेना को तितर-वितर करना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को हटाना, शत्रुसेना पर पहिले चढ़ाई करना, शत्रुसेना में घुसकर उसको चौंका देना, शत्रुसेना को तरह-तरह की तकलीफ देना, अपनी सेना को धैर्य देना, शत्रुसेना को घेरना, शत्रुद्वारा गिरफ्तार अपने सैनिकों को छुड़ाना. अपनी सेना के मार्ग पर शत्रुओं के अधिकार करने पर शत्रुसेना के मार्ग को अपने अधीन कर लेना, शत्रु के कोष तथा राजकुमार का अपहरण करना, पीछे तथा सामने की ओर आक्रमण करना, जिनके घोड़े मर गये हों, ऐसे सैनिकों का पीछा करना, भागी हुई शत्रुसेना का पीछा करना और बिखरी हुई अपनी सेना को संगठित करना—ये सभी कार्य घोड़ों के द्वारा आसानी से कराये जा सकते हैं, इसीलिए इन्हें अश्वकर्म कहते हैं ।
( १ ) अपनी सेना के आगे-आगे चलना, पहिले से तैयार न हुए मार्ग, निवास घाट आदि का बनाना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को तितर-वितर करना, नदी की गहराई बताने के लिए उसके भीतर प्रवेश करना, पंक्ति में खड़ा होकर शत्रु के आक्रमण को रोकना, इसी प्रकार मार्ग में चलना; इसी प्रकार नीचे उतरना, घने जंगलों तथा शत्रु की सेना में घुसना, शत्रु के पड़ाव में आग लगाना और अपने पड़ाव में लगी हुई आग को बुझाना, अकेले ही शत्रु पर विजय प्राप्त करना, अपनी बिखरी हुई सेना को संगठित करना, शत्रु की संगठित सेना को तितर-वितर करना, आपत्ति के समय अपनी सेना की रक्षा करना और शत्रु की सेना को कुचलना, अपने को दिखाने मात्र से ही शत्रु को घबड़ा देना, मदविह्वल होकर शत्रु को विचलित कर देना, अपने अस्तित्व से अपनी सेना के महत्त्व को प्रकट करना, शत्रु के योद्धाओं को पकड़ना, अपने योद्धाओं को छुड़ाना, शत्रु के परकोटे, प्रधान द्वार तथा अटारी आदि को ध्वस्त करना, शत्रु के कोष तथा सवारी आदि को भगा ले जाना, ये सभी कार्य हाथियों के द्वारा संपादित होने के कारण हस्तिकर्म के नाम से कहे जाते हैं ।