कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण
(१) अश्वस्य त्रयः पुरुषाः प्रतियोद्धारः, पञ्चदश रथस्य, हस्तिनो वा, पञ्च चाश्वाः । तावन्तः पादगोपाः वाजिरथद्विपानां विधेयाः । (२) त्रीणि त्रिकाण्यनीकं रथानामुरस्यं स्थापयेत् । तावत् कक्षं पक्षं चोभयतः । पञ्चचत्वारिंशदेवं रथा व्यूहे भवन्ति । (३) द्वे शते पञ्चविंशतिश्चाश्वाः, षट्शतानि पञ्चसप्ततिश्च पुरुषाः प्रतियोद्धारः । तावन्तः पादगोपा वाजिरथद्विपानाम् । (४) एष समव्यूहः । तस्य द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति । (५) पक्षकक्षोरस्यानामतो विषमसंख्याने विषमव्यूहः । तस्यापि द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दशविषमव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ।
( १ ) घुड़सवार सैनिक के आगे-आगे सहायतार्थ तीन प्रतियोद्धाओं को नियुक्त किया जाय । इसी प्रकार रथारोहियों या हस्त्यारोहियों के आगे पन्द्रह-पन्द्रह प्रतियोद्धाओं अथवा पाँच-पाँच घुड़सवार सैनिकों को खड़ा किया जाय । हस्ति तथा अश्व के सैनिकों के उतने ही ( पाँच ) खिदमतगार ( पादगोप ) नियुक्त किए जाँय । इसी प्रकार एक-एक रथ के आगे पाँच घोड़े, और एक-एक घोड़े के आगे तीन-तीन आदमी मिलाकर कुल पन्द्रह प्रतियोद्धा आगे चलने वाले और पाँच साईस, उसी तरह, हाथी के साथ भी समझने चाहिए ।
( २ ) व्यूहरचना के मध्यभाग (उरस्य) में इस प्रकार के नौ रथों (३ × ३ = ९) की नियुक्ति करनी चाहिए, अर्थात् तीन-तीन रथों की एक-एक पंक्ति बनाकर, तीन पंक्तियों में नौ रथों को खड़ा किया जाय । इसी प्रकार कक्ष और पक्ष स्थानों में दोनों ओर नौ-नौ रथों को खड़ा किया जाय । इस तरह एक व्यूह-रचना में ( ९ उरस्य, १८ कक्ष और १८ पक्ष = ४५ ) पैंतालीस रथ हो जाते हैं ।
( ३ ) प्रत्येक रथ के आगे पाँच-पाँच घोड़े होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे दो सौ-पच्चीस घोड़े होने चाहिए । इसी प्रकार प्रत्येक रथ के आगे पन्द्रह सैनिक होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे छः सौ पचहत्तर सैनिक एक-दूसरे की सहायतार्थ नियुक्त होने चाहिए । घोड़े, रथ और हाथियों के उतने ही साईस भी होने चाहिए ।
( ४ ) इस ढंग से तैयार किये गये व्यूह को समव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में दो-दो रथ बढ़ाकर इक्कीस रथों तक की वृद्धि की जा सकती है । इस प्रकार के अयुग्म में तीन रथों से लेकर इक्कीस रथों तक दस तरह की समव्यूह रचना की जा सकती है ।
( ५ ) आगे पीछे और बीच के स्थानों में यदि रथों की विषम संख्या हो जाय तो उसको विषमव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में भी उक्त रीति से दो-दो रथ बढ़ाकर