भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 742, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 742

६५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) हस्तिनामेव तु शुद्धः । सान्नाह्यानामुरस्यम्, औपवाह्यानां जघनं, व्यालानां कोटचाविति । (२) अश्वव्यूहो वर्मिणामुरस्यं शुद्धानां कक्षपक्षाविति । (३) पत्तिव्यूहः पुरस्तादावरणिनः पृष्ठतो धन्विन इति । शुद्धाः । (४) पत्तयः पक्षयोरश्वाः पार्श्वयोः, हस्तिनः पृष्ठतो रथाः पुरस्तात्, परव्यूहवशेन वा विपर्यास इति । द्वयङ्गबलविभागः । तेन त्र्यङ्गबलविभागो व्याख्यातः । (५) दण्डसम्पत् सारबलं पुंसाम् । (६) हस्त्यश्वयोर्विशेषः । कुलं जातिः सत्त्वं वयःस्थता प्राणो वर्ष्म जवस्तेजः शिल्पं स्थैर्यमुदग्रता विधेयत्वं सुव्यञ्जनाचारतेति ।


रथों को खड़ा किया जाय । इसी व्यूह-रचना का एक दूसरा ढंग यह भी है कि मध्य में हाथी, पीछे की ओर रथ और आगे की ओर घोड़े खड़े किए जायँ । इस व्यूह-रचना में हाथियों को मध्य भाग में रखने के कारण मध्यभेदी कहते हैं । इसके विपरीत—पीछे हाथी, बीच में घोड़े और आगे रथों की व्यूह-रचना को अन्तर्भेदी कहते हैं ।

( १ ) केवल हाथियों द्वारा की गई व्यूह-रचना को शुद्ध कहते हैं । ऐसे व्यूह में युद्ध योग्य हाथियों को बीच में रखा जाय और जो उन्मत्त एवं दुष्ट स्वभाव के हों उन्हें आगे के दोनों भागों में नियुक्त किया जाय ।

( २ ) घोड़ों के शुद्ध व्यूह में कवचधारी घोड़ों को बीच में और कवचरहित घोड़ों को आगे-पीछे रखना चाहिए ।

( ३ ) इसी प्रकार पैदल सेना के शुद्ध व्यूह में कवचधारी सैनिकों को आगे के दोनों भागों में और धनुर्धारी सैनिकों को पीछे के दोनों भागों में खड़ा किया जाय ।

( ४ ) मिश्र व्यूहों में सेना के दो-दो अंगों को मिलाकर पैदल सिपाहियों को आगे के दोनों भागों में और घोड़ों को पीछे के दोनों भागों में रखा जाय, अथवा हाथियों को पीछे की ओर और रथों को आगे की ओर नियुक्त किया जाय, या शत्रु की व्यूह-रचना के वैपरीत्य में जैसा भी उचित हो वैसा किया जाय । इस प्रकार सेना के दो अंगों द्वारा तीन प्रकार की व्यूह-रचना की जा सकती है और इसी प्रकार सेना के तीन अंगों को लेकर व्यूह-रचना का विभाग किया जा सकता है ।

( ५ ) जो पैदल सेना वंश-परम्परा से नियमित रूप से चली आ रही हो, जो नित्य तथा वश में रहने वाली हो उसे सारबल कहते हैं ।

( ६ ) कुल, जाति, धैर्य, कार्यक्षमता, आयु, शारीरिक बल, ऊँचाई, चौड़ाई,

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला) · पृष्ठ 742, कुल 918 में से · BharatKosha