कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६६१
( १ ) एतेन विधिना व्यूहानोजान् युग्मांश्च कारयेत् ।
विभवो यावदङ्गानां चतुर्णां सदृशो भवेत् ॥
( २ ) द्वे शते धनुषां गत्वा राजा तिष्ठेत् प्रतिग्रहे ।
भिन्नसङ्घातनं तस्मान्न युध्येताप्रतिग्रहः ॥इति साङ्ग्रामिके दशमेऽधिकरणे पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि चेति पञ्चमोऽध्यायः, आदितो द्वात्रिंशदुत्तरशततमः ।
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( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को अयुग्म तथा युग्म व्यूहों की रचना करनी चाहिए । अपने हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल अंगों के अनुसार ही अपने व्यूहों की रचना करनी चाहिए ।
( २ ) राजा को चाहिए कि युद्ध आरंभ हो जाने पर वह युद्धभूमि से दो-सौ धनुष की दूरी पर ठहरे । ऐसी स्थिति में वह शत्रु द्वारा छिन्न-भिन्न अपनी सेना को फिर एकत्र कर सकता है । इसलिए सेना के पृष्ठ भाग का आश्रय लिये बिना राजा को कदापि युद्ध न करना चाहिए ।
सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।
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