भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७५

निर्दोषो ते भार्या; गूढमस्मिन् प्रतिकर्तव्यम् । अहमपि तावत्प्रतिपत्स्यामि' इति । एवमादिषु कलहस्थानेषु स्वयमुत्पन्ने वा कलहे तीक्ष्णैरुत्पादिते वा हीनपक्षं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेदपवाहयेद् वा ।

(१) सङ्घेष्वेवमेकराजो वर्तेत । सङ्घाश्चाप्येवमेकराजादेतेभ्योऽतिसन्धानेभ्यो रक्षेयुः ।

(२) सङ्घमुख्यश्च सङ्घेषु न्यायवृत्तिर्हितः प्रियः ।
दान्तो युक्तजनस्तिष्ठेत्सर्वचित्तानुवर्तकः ॥

इति संघवृत्ते एकादशेऽधिकरणे भेदोपादानानि उपांशुदण्डश्चेति प्रथमोऽध्यायः;
आदितश्चतुस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं संघवृत्तं नाम एकादशमधिकरणम् ।

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आदि उपहार लेकर मुझे यहाँ आना पड़ा है । आपकी पत्नी सर्वथा निर्दोष है । इसलिए आप चुपचाप ही उस संघमुख्य का वध कर डालें । जब तक उसकी हत्या नहीं की जायगी तब तक डर के मारे मैं भी यहाँ से नहीं जा सकती हूँ ।' इस प्रकार कलह के कारणों के उत्पन्न होने पर अथवा तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा उत्पन्न किये जाने पर कमजोर संघमुख्य को विजिगीषु कोष तथा सेना की यथोचित सहायता देकर अपने वश में कर ले और अवसर आने पर उसे विरोधी संघमुख्यों के मुकाबले में युद्ध के लिए तैयार कर दे । यदि वह युद्ध करने में असमर्थ हो तो उसे अपने देश से बाहर कर दे ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु उन संघमुख्यों पर अपना आधिपत्य जमाये रखे और संघों को भी उचित है कि वे इस प्रकार की चेष्टा करने वालों तथा उनके द्वारा फैलाये गये षड्यन्त्रों से अपनी रक्षा करते रहें ।

( २ ) अतः संघमुख्य को चाहिए कि वह संघों के बीच में न्यायपूर्ण हितकारी और प्रिय व्यवहार करे । कभी भी उद्धत होकर बर्ताव न करे और अपने अनुकूल व्यक्तियों को सदा अपने समीप रखे तथा सब संघों के व्यक्तियों की राय से राज-व्यवहार चलाये ।

संघवृत्त नामक ग्यारहवें अधिकरण में भेदोपादान-उपांशुदण्ड नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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