कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) यत्प्रसह्य हरेदन्यस्तत्प्रयच्छेदुपायतः ।
रक्षेत्स्वदेहं न धनं का ह्यनित्ये धने दया ॥
इति आबलीयसनाम्नि द्वादशेऽधिकरणे दूतककर्मणि सन्धियाचनं नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितः पञ्चत्रिंशदधिकशततमः ।
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( १ ) यदि कोई बलवान् अभियोक्ता किसी दुर्बल राजा से बलात् धन आदि का अपहरण करे तो वह धन संधि आदि के बहाने उसी को दे देना चाहिए । धन की की अपेक्षा अपने प्राणों की अधिक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अनित्य धन पर अधिक मोह करना ठीक नहीं है । यदि जीवन रहेगा तो नष्ट हुआ धन फिर से पैदा किया जा सकता है ।
आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।
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