भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 774
६९०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ बारहवां अधिकरण

विक्रमयेदपवाहयेद्वा। योऽस्य पुत्रः समीपे दुर्गे वा प्रतिवसति, तं सत्रिणोप- जापयेत्—'आत्मसम्पन्नतस्त्वं पुत्रः तथाप्यन्तर्हितः, तत् किमुपेक्षसे। विक्रम्य गृहाण, पुरा त्वा युवराजो विनाशयति' इति। (१) तत्कुलीनमवरुद्धं वा हिरण्येन प्रतिलोभ्य ब्रूयात्—'अन्तर्बलं प्रत्यन्त- स्कन्धमन्यं वास्य प्रमृद्नीहि' इति। (२) आटविकानर्थमानाभ्यामुपगृह्य राज्यमस्य घातयेत्। (३) पार्ष्णिग्राहं वास्य ब्रूयाद्—'एष खलु राजा मामुच्छिद्य त्वामुच्छे- त्स्यति; पार्ष्णिमस्य गृहाण; त्वयि निवृत्तस्याहं पार्ष्णि ग्रहीष्यामि' इति। मित्राणि वास्य ब्रूयात्—'अहं वः सेतुः, मयि विभिन्ने सर्वानैष वो राजाप्ला- यिष्यति' इति। 'सम्भूय वास्य यात्रां विहनाम' इति। तत्संहतानां च प्रेष-


आदमियों पर उनके द्वारा चढ़ाई करा दे; या उनको राजा के यहाँ से कहीं दूसरी जगह भगा दें। तदनन्तर सभी गुप्तचर राजधानी में या अन्तपाल के पास दुर्ग में रहने वाले राजकुमार को इस प्रकार फुसलाएँ 'राजा ने जिस पुत्र को युवराज बनाया है, तुम्हारी योग्यता उससे किसी कदर कम नहीं है; फिर भी राजा ने तुम्हें नियन्त्रित कर रखा है। अब तुम इस बात की लापरवाही न करके राजा पर धावा बोल दो और राज्य को अपने अधीन कर लो। अन्यथा बहुत सम्भव है कि युवराज तुम्हें ही मार डाले।'

(१) अथवा शत्रु के किसी बन्धु-बांधव को या नजरबन्द राजकुमार को धन का प्रलोभन देकर सभी गुप्तचर इस प्रकार फुसलाएँ 'तुम राजा के मौलबल को या सीमा पर नियुक्त सेना को अथवा दूसरी किसी सेना को नष्ट कर डालो और आटविकों को धन तथा सत्कार से वश में करके उन्हीं के द्वारा शत्रु के राज्य पर चढ़ाई करा दो।'

(२) आटविकों को धन तथा सत्कार से वश में करके शत्रु के राज्य को उन्हीं के द्वारा नष्ट करवा दे। यहाँ तक सेनामुख्यों को वश में करने की युक्तियों का निरूपण किया गया है।

(३) विजिगीषु राजा शत्रु राजा के पार्ष्णिग्राह से कहे—'देखो, यह राजा मेरा उच्छेद करके फिर तुम्हारा भी अवश्यमेव उच्छेद करेगा। अतः तुम इसके पार्ष्णिग्राह बनकर पीछे से इस पर आक्रमण करो। जब वह तुम पर आक्रमण करेगा तब मैं उसकी पार्ष्णि ग्रहण कर उस पर आक्रमण कर दूँगा।' अथवा विजिगीषु शत्रु के मित्रों से कहे 'मैं ही तुम्हारा पुल हूँ। मेरे नष्ट हो जाने पर यह राजा तुमको भी नष्ट कर डालेगा। इसलिए हम सब मिलकर इसके आक्रमण का मुकाबला करें।' तदनन्तर विजिगीषु राजा अपने शत्रु के मित्रों तथा शत्रुओं को यह सन्देश भेजे कि 'निश्चित