कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण
(१) रात्राववस्कन्दं दत्त्वा सिद्धस्तिष्ठेत्, असिद्धः पार्श्वेनापगच्छेत्, पाषण्डच्छद्मना मन्दपरिवारो निर्गच्छेत्, प्रेतव्यञ्जनो वा गूढैर्निर्ह्रियेत, स्त्रीवेषधारी वा प्रेतमनुगच्छेत् । (२) दैवतोपहारश्राद्धप्रवहणेषु वा रसविद्धमन्नपानमवसृज्य कृतोपजापो दूष्यव्यञ्जनैर्निष्पत्य गूढसैन्योऽभिहन्यात् । (३) एवं गृहीतदुर्गो वा प्राश्यप्राशं चैत्यमुपस्थाप्य दैवतप्रतिमाच्छिद्रं प्रविश्यासीत, गूढभित्तिं वा दैवतप्रतिमायुक्तं भूमिगृहम् । विस्मृते सुरुङ्गया रात्रौ राजावासमनुप्रविश्य सुप्तममित्रं हन्यात् । यन्त्रविश्लेषणं वा विश्लेष्याधस्तादवपातयेत् । रसाग्नियोगेनावलिप्तं गृहं जतुगृहं वाधिशयानममित्रमादीपयेत् । (४) प्रमदवनविहाराणामन्यतमे वा विहारस्थाने प्रमत्तं भूमिगृहसुरुङ्गागूढभित्तिप्रविष्टास्तीक्ष्णा हन्युः, गूढप्रणिहिता वा रसेन । स्वपतो वा निरुद्धे देशे गूढाः स्त्रियः सर्परसाग्निधूमानुपरि मुञ्चेयुः ।
अपना दुर्ग वह शत्रु को देकर सुरंग के रास्ते बाहर निकल जाय; अथवा सुरंग न होने पर जहाँ से परकोटे की दीवार कच्ची हो उसको तोड़ कर बाहर निकल जाय ।
( १ ) रात में सोते समय शत्रु के ऊपर छापा मारने में यदि कार्यसिद्धि सम्भव हो तो दुर्बल राजा अपने दुर्ग में डटा रहे और यदि ऐसी आशा न हो तो पास से होकर निकल भागे । बाहर निकलने के लिए उसको चाहिए कि पाषण्डी का वेष बनाकर थोड़ा-सा परिवार साथ लेकर अथवा अर्थी पर रखकर गुप्तचरों के द्वारा या स्त्री का वेष धारण कर किसी मृतक की अर्थी के पीछे—इन तरीकों से वह बाहर निकल जाय ।
( २ ) देवबलि ( दैवतोपहार ), श्राद्ध तथा पार्टियों (प्रवहण) आदि के अवसरों पर शत्रु को विषाक्त अन्नादि देकर; या दूष्य गुप्तचरों द्वारा शत्रुपक्ष का उपजाप करके छिपी हुई सेना को लेकर दुर्बल राजा अपने शत्रु पर धावा बोल दे ।
( ३ ) इस प्रकार शत्रु के द्वारा अपना दुर्ग ले लिये जाने पर विजिगीषु राजा को चाहिए कि वह पर्याप्त खाद्यसामग्री रखकर किसी देवालय की प्रतिमा में छेद करके उसके भीतर घुस कर बैठ जाय; अथवा किसी दीवार पर छेद करके वहाँ बैठ जाय; या किसी देवप्रतिमा से युक्त तहखाने ( भूमिगृह ) में बैठ जाय । जब शत्रु राजा, विजिगीषु को सर्वथा नष्ट हुआ जानकर सर्वथा भुला दे तब सुरंग के द्वारा रात में राजा के शयनागार में प्रविष्ट होकर वह राजा को मार डाले; अथवा शयनागार में लगे यन्त्र को ढीला करके उसको राजा के ऊपर गिरा दे; अथवा अग्निरक्षित घर में या लाख के घर में सोते हुए शत्रु राजा को मार डाले ।
( ४ ) अथवा प्रमदवन और विहार में या केवल विहार में मदविह्वल शत्रु राजा