कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तेरहवां अधिकरण |
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धायाग्निमालादर्शनम्, शिलाशिक्यावगृहीते प्लवके स्थानम्, उदकबस्तिना जरायुणा वा शिरोऽवगूढनासः पृषतान्त्रकुलीरनक्रशिशुमारोद्भवसाभिर्वा शतपाकं तैलं नस्तः प्रयोगः तेन रात्रिगणशश्चरति इत्युदकचरणानि, तैर्वरुणनागकन्यावाक्यक्रिया सम्भाषणं च, कोपस्थानेषु मुखादग्निधूमोत्सर्गः । (१) तदस्य स्वविषये कार्तान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकपौराणिकैक्षणिकगूढपुरुषाः साचिव्यकरास्तद्दर्शिनश्च प्रकाशयेयुः । परस्य विषये दैवतदर्शनं दिव्यकोशदण्डोत्पत्तिं च अस्य ब्रूयुः । दैवतप्रश्ननिमित्तवायसाङ्गविद्यास्वप्नमृगपक्षिव्याहारेषु चास्य विजयं ब्रूयुः, विपरीतममित्रस्य सदुन्दुभिमुल्कां च परस्य नक्षत्रे दर्शयेयुः ।
नागदेव तथा वरुण के वेष में रहने वाले गुप्तचर से बातचीत करे और उनकी पूजा भी करे । रात में मजबूत एवं जिनके भीतर पानी प्रवेश न कर सके, ऐसी पेटियों में रेता भर कर उनको पानी में छिपा दिया जाय और फिर उसके द्वारा पानी में आग लगाकर दिखाया जाय । रस्सियों में पत्थर बांध कर उनको नाव के नीचे से पानी में लटका दिया जाय, जिससे कि तेज धारा में नाव स्थिर खड़ी रह जाय । उदकबस्ती ( वाटरप्रूफ कपड़ा ) अथवा जरायु ( गर्भाशय के समान बनी हुई चमड़े की थैली ) से शिर और नासिका ढककर, साँभर की आंत ( पृषतान्त्र ), केंकडा ( कुलीर ), मगर ( नक्र ), शिरस नामक मछली ( शिशुमार ) और ऊद ( उद्भ ) नाम की मछली की चर्बी के साथ तेल को सौ बार पका कर उसका जो घोल तैयार हो उसको नाक में डाल दिया जाय । ऐसा करने से रात में झुंड के झुंड पुरुष जल में संतरण कर सकते हैं । जल में तैरते हुए वे पुरुष वरुण या नाग की कन्याओं जैसी आवाज निकालें और राजा उनके साथ बातचीत करे । क्रोधावेश प्रकट करते समय राजा औषधियों के द्वारा अपने मुँह से आग और धुआँ उगले ।
( १ ) राजा की उक्त आश्चर्यमयी बातों को उसके सहायक तथा दैवज्ञ ( कार्तान्तिक ), शुभाशुभ फल को बताने वाले ( नैमित्तिक ), ज्योतिषी ( मौहूर्तिक ), कथा-वाचक ( पौराणिक ), प्रश्नवक्ता ( ईक्षणिक ) और गुप्तपुरुष सर्वत्र प्रचारित करें । शत्रुदेश में भी ये लोग राजा के दैव-साक्षात्कार तथा स्वेच्छया दिव्यकोष एवं दिव्य सेना को पैदा कर देने की सनसनीपूर्ण खबर फैला दें । दैवतप्रश्न ( भाग्यप्रश्न ), शकुन ( निमित्त ), काकविद्या ( वायसविद्या ), अंग को देखकर फलाफल का निर्देश ( अंगविद्या ), स्वप्न, पशु-पक्षी आदि सभी निमित्तों से राजा की विजय को सूचित किया जाय और उल्कापात आदि को दिखाकर यह प्रसिद्धि करें कि शत्रु का कोई बड़ा अनिष्ट होने वाला है ।