कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 806, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १७४-१७५ | ## पर्युपासनकर्म, अवमर्दश्च |
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| अध्याय ४ |
(१) कर्शनपूर्वं पर्युपासनकर्म । जनपदं यथानिविष्टमभये स्थापयेत् । उत्थितमनुग्रहपरिहाराभ्यां निवेशयेदन्यत्रापसरतः, समग्रमन्यस्यां भूमौ निवेशयेदेकस्यां वा वासयेत् । न ह्यजनो जनपदो राज्यमजनपदं वा भवतीति कौटिल्यः ।
(२) विषमस्थस्य मुष्टिं सस्यं वा हन्याद्वीवधप्रसारौ च ।
(३) प्रसारवीवधच्छेदान्मुष्टिसस्यवधादपि ।
वमनाद् गूढघाताच जायते प्रकृतिक्षयः ॥(४) 'प्रभूतगुणवद्धान्यकुप्ययन्त्रशस्त्रावरणविष्टिरश्मिसमग्रं मे सैन्य-
शत्रु के दुर्ग को घेर कर अपने अधिकार में करना
( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के कोष, सैन्य और अमात्य आदि का नाश करने के साथ ही उसके दुर्ग को चारों ओर से घेर दे । किन्तु ऐसी स्थिति में विजिगीषु को ध्यान रखना चाहिए कि जनपद को किसी प्रकार का कष्ट न होने पावे, वरन्, उसकी रक्षा का सुप्रबंध करे । यदि जनपद विजिगीषु के विरुद्ध आंदोलन करे तो उसे धन देकर या कर माफ करके शांत किया जाय । किन्तु ऐसा यत्न उसी दशा में करना चाहिए जब जनपद अपने स्थान पर बना रहे; अन्यथा उसकी कुछ भी सहायता न की जाय । उस जनपद के विभिन्न भागों में अधिकाधिक आदमियों को बसाया जाय अथवा एक ही भाग में अधिक आदमियों को बसाया जाय; क्योंकि मनुष्यों से रहित प्रदेश जनपद नहीं कहला सकता और जनपदरहित भूमि राज्य नहीं कहला सकती । इसीलिए कौटिल्य का कहना है कि 'यदि जनपद न होगा तो राज्य किस पर किया जायगा ?'
( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह विपत्तिग्रस्त शत्रु के अन्न, फसल, वीवध और प्रसार आदि सबको नष्ट कर दे ।
( ३ ) वीवध, प्रसार आदि का उच्छेद कर देने से तथा फसल, अनाज, व्यापार आदि को नष्ट कर देने से और अमात्य आदि प्रकृतिवर्ग कहीं दूसरी जगह ले जाने से या चुपचाप उन्हें मार देने से राजा का अपने आप क्षय हो जाता है ।
( ४ ) जब विजिगीषु यह समझे कि 'प्रभूत गुणों से संपन्न धान्य, लोहा, ताँबा,