भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 813

प्र० १७४-१७५ : अ० ४ ] दुर्ग को अधिकार में करना ७२९

(१) दृष्यामित्राटविकद्वेष्यप्रत्यपसृताश्च कृतार्थमानसञ्ज्ञाचित्ताः परदुर्गमवस्कन्देयुः । (२) परदुर्गमवस्कन्द्य स्कन्धावारं वा पतितपराङ्मुखाभिपन्नमुक्तकेशशस्त्रभयविरूपेभ्यश्चाभयमयुध्यमानेभ्यश्च दद्युः । परदुर्गमवाप्य विशुद्धशत्रुपक्षः कृतोपांशुदण्डप्रतीकारमन्तर्बहिश्च प्रविशेत् । (३) एवं विजिगीषुरमित्रभूमिं लब्ध्वा मध्यमं लिप्सेत । तत्सिद्धावुदासीनम् । एष प्रथमो मार्गः पृथिवीं जेतुम् । (४) मध्यमोदासीनयोरभावे गुणातिशयेनारिप्रकृतीः साधयेत् । तत उत्तराः प्रकृतीः । एष द्वितीयो मार्गः । (५) मण्डलस्याभावे शत्रुणार मित्रं मित्रेण वा शत्रुमुभयतः सम्पीडनेन साधयेत् । एष तृतीयो मार्गः ।


( १ ) शत्रु के दुर्ग का अपहरण करते समय शत्रु के राजद्रोही, शत्रु, आटविक, शत्रु के पास से एक बार जाकर फिर वापिस आने वाले, विजिगीषु द्वारा धन-मान से सम्मानित और आक्रमण के समय तथा स्थान से परिचित आदि बड़े सहायक होते हैं ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि जब शत्रु की छावनी पर अधिकार कर ले तो ऐसे सैनिकों को अभयदान दे दे, जो युद्धक्षेत्र में जख्मी पड़े हों, जो युद्ध से भाग गए हों, जो अधिक विपद्ग्रस्त हों, जिनके बाल-शस्त्र अस्त-व्यस्त हों, जिनके मुख भय से विकृत हो गये हों और जो युद्ध में शामिल न हुए हों । शत्रु के दुर्ग को प्राप्त करके और वहां से शत्रुपक्ष के सभी व्यक्तियों की सफाई करने के बाद विजिगीषु को चाहिए कि वह अपना विरोध करने वाले व्यक्तियों का उपांशु वध करके दुर्ग के बाहर और भीतर प्रवेश करे ।

( ३ ) इस प्रकार शत्रु राज्य जो स्वायत्त करने के बाद विजिगीषु, मध्यम राजा को जीतने की कोशिश करे और उसको स्वायत्त कर लेने के बाद वह उदासीन राजा पर विजय प्राप्त करे । पृथिवी का साम्राज्य प्राप्त करने का यह पहिला मार्ग है ।

( ४ ) मध्यम और उदासीन राजाओं के न होने पर विजिगीषु अपने गुण-बाहुल्य के द्वारा शत्रु के प्रकृतिवर्ग को अपने अनुकूल बनाये और उसके बाद शत्रु की सेना तथा कोष को अपने अधिकार में करे । पृथिवी का आधिपत्य प्राप्त करने का यह दूसरा मार्ग है ।

( ५ ) यदि राजमण्डल का अभाव हो तो शत्रु के द्वारा मित्र को और मित्र के द्वारा शत्रु को दोनों ओर से घेर कर या दबा कर उन्हें विजिगीषु अपने वश में करे । पृथिवी को विजय करने का यह तीसरा मार्ग है ।

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