कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण १७६ | लब्धप्रशमनम् |
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| अध्याय ५ |
(१) द्विविधं विजिगीषोः समुत्थानम्, अटव्यादिकमेकग्रामादिकं च । (२) त्रिविधश्चास्य लम्भः—नवो, भूतपूर्वः, पित्र्य इति । (३) नवमवाप्य लम्भं परदोषान् स्वगुणैश्छादयेत् गुणान् गुणद्वैगुण्येन । स्वधर्मकर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिश्च प्रकृतिप्रियहितान्यनुवर्तेत । यथासम्भाषितं च कृत्यपक्षमुपग्राहयेत् । भूयश्च कृतप्रयासम् । अविश्वास्यो हि विसंवादकः स्वेषां परेषां च भवति । प्रकृतिविरुद्धाचारश्च । तस्मात्समानशीलवेषभाषाचारतामुपगच्छेत् । देशदैवतसमाजोत्सवविहारेषु च भक्तिमनुवर्तेत ।
विजित देश में शान्ति की स्थापना
( १ ) विजिगीषु का उद्योग ( समुत्थान ) दो रूपों में फलित होता है । एक जंगल आदि के रूप में और दूसरा गाँव आदि के रूप में ।
( २ ) विजिगीषु का लाभ तीन प्रकार का होता है । १. नव २. भूतपूर्व और ३. पित्र्य ।
( ३ ) नवलाभ : विजिगीषु को चाहिए कि नए राज्य को प्राप्त कर वह शत्रु के दोषों को अपने गुणों से ढक दे और शत्रु के गुणों को अपने दुगुने गुणों से पराभूत कर दे । विजिगीषु सदा अपने धर्म, कर्म, अनुग्रह, परिहार ( करमाफी ), दान और सम्मान आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा प्रजा के अनुकूल कल्याणकारी कार्यों के करने में लगा रहे । अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार अपने कृत्यपक्ष को धन आदि देकर वह सदा प्रसन्न बनाये रखे और जिस प्रजाजन या मित्र ने उसके अभ्युदय में अधिक परिश्रम किया हो उसे विपुल धन देकर खूब प्रसन्न कर दे क्योंकि पहिले प्रतिज्ञा कर बाद में उससे मुकर जाने वाला अपने प्रजावर्ग के विरुद्ध आचरण करने वाला राजा अपने तथा पराये सभी का विश्वास खो बैठता है । इसलिए राजा को उचित है कि वह अपने प्रजाजनों के समान ही शील, वेष, भाषा तथा आचरण का व्यवहार करे और प्रजा के विश्वासों की तरह राष्ट्रदेवता, समाजोत्सव तथा विहारों में अपनी भक्तिभावना रखे ।