भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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७३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) चरित्रमकृतं धर्म्यं कृतं चान्यैः प्रवर्तयेत् । प्रवर्तयेन्न चाधर्म्यं कृतं चान्यैर्निवर्तयेत् ॥

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे लब्धप्रशमनं नाम पञ्चमोऽध्यायः;

आदितश्चतुश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

समाप्तमिदं दुर्गलम्भोपायनामकं त्रयोदशमधिकरणम् ।

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( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि विजित राज्य में वह उन धर्मयुक्त आचार-व्यवहारों का प्रचलन करे, जिसका अब तक वहाँ अभाव था, तथा जो धर्मप्रवृत्त लोग रहे हों उन्हें प्रोत्साहित करे। अधर्मयुक्त आचार-व्यवहारों को वह कतई न पनपने दे तथा जो लोग अधर्मप्रवृत्त रहे हों उन्हें यत्नपूर्वक रोके।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में लब्धप्रशमन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

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